Sunday, November 19, 2017

सह वीर्यं करवावहै -

       हरिद्वार के उपजिलाधिकारी मनीष कुछ नए नए प्रयोग करते रहते हैं मनीष ने अभी हाल में सरकारी आवासीय विद्यालय अलीपुर व बाल कुंज बहादराबाद के बच्चों जिनमे ज्यादातर गरीब घरों से हैं को रॉयल पब्लिक स्कूल रोहालकी के बच्चों के साथ उनके कैम्पस में ट्रेनिंग दिलवायी ।तीनों स्कूलों के बच्चे एक साथ बैठे और आपस मे बातें भी की। इस कार्य मे पहल की रॉयल पब्लिक स्कूल के मालिक रजनीश चौहान ने ।इस पहल का साक्षी मै भी बना । ये प्रयोग इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि बढ़ते "एजुकेशनल डिवाइड " को कैसे कम किया जाय । एक तरफ सुविधा सम्पन्न अप टू डेट पब्लिक स्कूल है दूसरी तरफ बदहाल गरीब तबका ।यदि सारे पब्लिक स्कूल इस राह पर चल निकलें तो शिक्षा और देश की तस्वीर बदल सकती है । ज्यादा न सही पब्लिक स्कूल एक सरकारी स्कूल को तो गोद ले ही सकते हैं -

Sunday, June 18, 2017

Missing World -आ लौट के आ जा मेरे...

मेरे मित्र जो उत्तराखंड पुलिस सेवा के एक कर्मठ अधिकारी हैं श्री मनोज कत्याल जी  पिछले कुछ दिनों से एक गहरी पीड़ा से गुजर रहे थे हुआ यूँ कि उनके बुजुर्ग ससुर (बाबू जी )घर से कही जाने के लिए पैदल निकले और घर लौट के नहीं आये।  घर वाले खोज -खोज के परेशान हो गए।  शुगर और ब्लड प्रेशर की दवा घर पे छूटी हुई थी।  किसी अनहोनी की चिंता सबको घेरे हुई थी पुलिस विभाग होने के नाते हर जगह की पुलिस उन्हें मदद कर रही थी लेकिन बाबू जी का पता नहीं चल पा रहा था.  सोशल मीडिया से लेकर न जाने कितने तौर तरीके आजमाए गए सब असफल साबित हुए , सब निराश हो गए थे कि अचानक एक फोन ने उनके परिवार को जैसे जीवन दान दे दिया  हुआ यूँ कि बाबू जी ट्रेन  के पायदान से फिसल कर अनजान जगह में गिर गए , कई दिन अस्पताल में रहे, जेब में एक गैस बुकिंग  की रसीद पर घर का पता लिखा था बस इसी पते ने बाबू जी को फिर से उनके घर वालों से मिलवा दिया।  जब से मानव इस धरती पर संवेदनशील हुआ होगा परिवार तब से अस्तित्व में आया होगा।  माँ -बाप, भाई -बहन, दादा- दादी, नाना- नानी, बुआ, मामा जैसे रिश्ते  ईजाद हुए होंगे।  मन ने मन की भाषा पढ़ी होगी, दिल ने दिल के जज्बात समझे होंगे और परिवार के बंधन प्रगाढ़ हुए होंगे।  परिवार पालन -पोषण ,संस्कार ,शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के आधार बने होंगे। परिवार से बाहर जीवन दुःखद न सही तो आसान आज भी नहीं है।  इस दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं जो जाने अनजाने अपने प्रियजन और परिजनों से बिछड़ जाते हैं. होते वो इसी धरती पर हैं पर उनका मिलना मुश्किल हो जाता है कुछ किस्मत वाले होते हैं जिनके अपने उन्हें मिल जाते हैं लेकिन सबकी किस्मत इतनी अच्छी नहीं होती। बहुत से भटके लोग दर -दर भटकते रहते हैं कभी खाना नहीं मिलता कभी पानी नहीं मिलता। कभी बारिश में भीगना पड़ता है कभी ठण्ड में काँपना ।बीमारी आती भी अपने मन से है और जाती भी अपने मन से है।   हिंदुस्तान में ऐसे लोग शहरों कस्बों और गाँव -देहात में कहीं भी देखे जा सकते हैं।  इन्हे देख कर आप के मन में भी विचार तो जरूर आता होगा कि ये कौन लोग हैं ?क्या इनका कोई घर नहीं ?क्या इनका कोई परिवार नहीं ? आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ हिंदुस्तान  में 270 औरतें और 180 बच्चे प्रतिदिन खो जाते हैं जिनमे से लगभग एक चौथाई का पता नहीं चल पाता है।  पुलिस और मीडिया की भाषा में इन्हे मिसिंग परसन कहा जाता है।  अक्सर आप अख़बारों में खोये हुए लोगों के विज्ञापन देखते होंगे टीवी और रेडियो  पर उनके विवरण सुनते होंगे दीवारों, बसों  पर पोस्टर देखते होंगे लेकिन सोचते होंगे मुझे क्या लेना-देना इनसे और हाँ पता नहीं कहाँ होंगे ये ? कौन इस में दिमाग खपाये।  लेकिन इस दर्द को उस मां -बाप के पूछिए जिसका बच्चा खो गया है उनकी पूरी जिंदगी इस टीस के साथ गुजरती है जिसे वो बयाँ नहीं कर पाते, सिर्फ घुट -घुट के जीते हैं ।  यही हाल उन बच्चों का होता है जिनके मां या बाप कहीं खो जाते हैं। जो खो जाते हैं उनकी जिंदगी प्रायः बड़े बदतर हालातों से गुजरती है खासकर वे बच्चे जो छोटे होते हैं या वे बुजुर्ग जिनकी मानसिक अवस्था सही नहीं होती।  बहुत कम महिलाएं भाग्यशाली होती हैं जिन्हे किसी शरणालय में जगह मिलती है ज्यादातर औरते और बच्चे अपराध पेशा गिरोह के हत्थे चढ़ जाते हैं और ताउम्र उस गिरोह की कीमत चुकाते रहते हैं भीख मंगवाने,मजदूरी ,देह व्यापार से लेकर उनकी  किडनी और लिवर का धंधा भी ये गिरोह बड़े शातिराना अंदाज में करते हैं।कच्ची उम्र में बेहतर जिंदगी की चाहत बहुत से बच्चों को होती है जो घर से भाग जाते हैं लेकिन उन्हें क्या पता माँ बाप हर जगह नहीं मिलते।  उपेक्षा के शिकार बुजुर्ग या याददाश्त खो चुके बुजुर्ग अक्सर अनाथ से घूमते रहते हैं।
            देहरादून में ऐसे लोगों के लिए काम कर रहे "हेल्पिंग हैंड" संस्था के संचालक डॉ अंजुम बताते है कि घंटाघर चौराहे पर भीख मांगने वाले बच्चों की जेब नहीं होती। वो हर पांच दस मिनट बाद अपने बॉस ,जो किसी किनारे खड़े होकर उन्हें वाच करता है ,को पैसा दे आते हैं और फिर भीख मांगने में जुट जाते हैं शाम को ये बच्चे वहां नज़र नहीं आते और अगली सुबह फिर आ जाते हैं। बच्चों को ढूंढने में सबसे बड़ी समस्या ये होती है कि बच्चों का चेहरा उम्र बढ़ने के साथ-साथ बहुत तेजी से बदलता है पांच या छः साल बाद खुद माँ बाप को भी वो घूमते हुए अचानक मिल जाय तो शायद वे भी न पहचान पाएं।  हिंदुस्तान में संभवतः इसीलिये हाथ में नाम और पता गोदवाने की परम्परा खूब प्रचलित थी।  पागल और भिखारी के रूप में फुटपाथ पर रहने वाले बहुत से लोग दरअसल घर से भटके हुए लोग होते हैं जो अपना घर भूल जाते हैं और  जिन्हे उनके घर वाले तलाश रहे होते हैं।  शरणालयों में रह रहे बहुत से लोग अपने लोगों के पास जाना चाहते हैं लेकिन वो घर का पता नहीं बता पाते ऐसे लोगों के घर को पता करने के लिए बहुत सूझ -बूझ की जरूरत होती है जैसे भाषा ,बोली, पहनावा ,खान-पान की पसंद आदि।  संवासिनी गृह देहरादून में ऐसे लोगों पर जब यह प्रयास किया गया तो परिणाम आशातीत रहे।वन सेवा के एक संवेदनशील ईमानदार अधिकारी रामचंद्रन जी  ने न जाने कितने परिवारों की खुशियां वापस लौटा दी. तमिलनाडु ,उड़ीसा ,नेपाल के लोग जो अपनों को वापस पाने की आशा खो चुके थे उनके अपनों का वापस मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं था। फुटपाथ पर पड़े लोगों को घर तलाशने में डॉ अंजुम और उनकी युवा टीम जिसका सदस्य मै भी रहा ने मिशन घर वापसी की शुरुआत की उनकी टीम ने इस काम में  दिन रात एक कर दिए और बहुत से लोगों को उन्होंने उनके परिजनों से मिलवाने में  अहम भूमिका निभाई। डॉ अंजुम और उनकी टीम दिन में एक घंटा ऐसे लोगों के पास गुजारती है और उनको अपना बना कर उनके घर का पता लगाती है इस नेक काम के चलते आज कई घरों की दुवाएँ उनके खाते में हैं।  ये सिलसिला फेसबुक पर कुछ नेक लोगों ने नो मोर मिसिंग और मिसिंग पीपल इन इंडिया के नाम से भी जारी रखा है जिसमे जुड़ने वालों की तादात लाखों में है और उनके साथ है सफलता का अनकहा आनंद जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है । कई प्रदेशों की पुलिस मिसिंग पर्सन की सूचना अलग साइट पर डालती है उसे सीसीटीएनएस से जोड़ने की पहल हुई है।  इस सबके बावजूद ये प्रयास जन सहयोग के बिना  नाकाफी हैं। "आधार " इस दिशा में नई उम्मीद की किरण है जिससे भटके हुए आदमी के घर का पता लगाया जा सकता है।बच्चों के लिए यह आधार बहुत ही सहायक हो सकता है।  लेकिन इस सबके लिए समय और प्रयास की जरूरत होती है जो इस भागदौड़ भरी दुनिया में बहुत कम लोगों के पास है। फिर भी  आदमी को ट्रेक करने का सॉफ्टवेयर या बायो-चिप  जब तक ईज़ाद नहीं हो जाती ये प्रयास हम सबको जारी रखना होगा क्या पता किसी को उसकी खोयी हुई दुनिया वापस मिल जाय। -ललित 

Sunday, May 14, 2017

अपनी संस्कृति-

ये फोटो दक्षिण कोरिया की है अभिवादन और सम्मान की हर देश की अपनी परम्परा होती है। कोई हाथ मिलाता है तो कोई माथा चूमता है और कोई गले मिलता है।  भारत की प्राचीन पद्धति में  बड़ों का सम्मान पैर छू कर और पैर धोकर किया जाता रहा है  हिंदुस्तान में आधुनिक लोग विदेशी संस्कृति से इतने प्रभावित हुए कि अपनी पैर छूने की परम्परा का मजाक उड़ाने लगे। मीडिया भी उसी बयार में बहने लगी।  जबकि पैर छूने की परम्परा कही ज्यादा वैज्ञानिक और सम्मान जनक  है।  दक्षिण कोरिया की इस फोटो से कुछ आत्मबोध जग जाय तो बेहतर।  अपनी संस्कृति उधार की संस्कृति से सदैव बेहतर है -

Saturday, April 8, 2017

Rebooting education-

  www.jhallarmallarduniya.blogspot.com  -(डॉ ललित नारायण मिश्र )
       मेरे पिछले लेख स्कूल और हम पर कई लोगों ने अपने सुझाव और मंतव्य दिए। कई लोगों ने इस प्रवृत्ति से निपटने का उपाय लिखने को कहा।  सरकारी स्कूल कैसे अपनी खोयी हुई गरिमा को पाएं और किस तरह शिक्षा के बाजार में अपनी रफ़्तार और प्रतिस्पर्धा बनाये रखें इस बात पर चर्चा से पहले कुछ उदाहरण की चर्चा कर ली जाय तो  बात आसानी से समझ में आ जाएगी। दरअसल समस्या इतनी बड़ी नहीं है समस्या शुरुआत यानि पहल करने की है
        मेरे प्रिय मित्र आशुतोष ने एक बहुत ही प्रेरक अनुभव साझा किया।  परसा पटना बिहार के पास स्थित एक क़स्बा है  जहाँ एक सरकारी स्कूल नब्बे के दशक में नक्सलवाद की चपेट में आ गया स्कूल में मास्टर थे लेकिन बच्चे पढ़ने नहीं आते थे स्थानीय लोग स्कूल के मास्टरों से नक्सल टैक्स वसूल करते थे। यह सिलसिला एक नए नए ट्रांसफर होकर आये एक प्रिंसिपल ने तोड़ा। उन्होंने गांव के लोगों से कहा कि हम नक्सल टैक्स तब देंगे जब आप अपने बच्चों को स्कूल में पढ़ने के लिए भेजें पहले विरोध हुआ धीरे धीरे शुरुआत हुई और बच्चे पढ़ने आने लगे. स्थितियों को बदलने में लगभग 3-4 वर्ष लग गए और ये सिलसिला चल निकला लेकिन जो सुधार हुआ वो आशातीत था कई बच्चे अपने माँ बाप के मार्गदर्शक बने। नक्सल टैक्स तो समाप्त हुआ ही वहीं कुछ बच्चे प्रशासनिक सेवाओं में भी चयनित हुए।
             देहरादून के देहरा मिडल स्कूल को एक जुनूनी सरकारी मास्टर द्वारा जिस ऊंचाई तक पहुंचा दिया गया वह दास्तान किसी आश्चर्य से कम नहीं है। एच एस उनियाल ने जब इस स्कूल को संभाला तो स्कूल बंदी के कगार पर था प्राइवेट बिल्डिंग में चल रहे इस सरकारी स्कूल पर मुकदमों की भी एक लम्बी लाइन थी कि किस तरह यह स्कूल अलग भाग जाय।  धीरे धीरे उनियाल ने स्लम बस्ती के बच्चों और अनाथ बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तो आम जनता भी धीरे धीरे जुड़ने लगी किसी ने कम्प्यूटर भेंट किया किसी ने किचेन के बर्तन।  धीरे धीरे यह स्कूल रात में भी चलने लगा और अनौपचारिक रूप से रेजीडेंसियल स्कूल बन गया। लगभग दो सौ बच्चों में 70 बच्चे अनाथ या भटके हुए बच्चे हैं शहर के कई लोग अपने बच्चों का जन्मदिन या अपनी सालगिरह किसी होटल के बजाय इन बच्चों के साथ मनाना पसंद करते हैं इन बच्चों की दुनिया उनियाल हैं जो कि एक सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल हैं।
      फैज़ाबाद उ प्र के सोहावल ब्लॉक के गौरा बभनान स्कूल की हालत किसी और सरकारी  स्कूल से बेहतर नहीं थी  बच्चे खेती और घरेलू व्यवसाय  के कामों में माँ बाप का हाथ बंटाते थे स्कूल कम ही आते थे, आते थे तो मिड डे मील खाकर चले जाते थे ठीक से बैठने की व्यवस्था नहीं, वही घिसा पिटा  ब्लैकबोर्ड वगैरह वगैरह। इसे बदला डॉ आशुतोष सिंह और रुपाली अग्रवाल की इच्छाशक्ति ने।  रुपाली प्राइवेट स्कूल में पढ़ा चुकी थीं उनके अनुभव को प्रिंसिपल डॉ आशुतोष सिंह ने सही दिशा दी  और वही प्रयोग सरकारी स्कूल में लागू कर दिए गए नए तरीके से पढाई , क्राफ्ट कला इत्यादि।  पेरेंट्स से मिलकर उन्हें मोटिवेट किया मिड डे मील को घर के खाने से बेहतर बना दिया प्राइवेट स्कूल की तरह आई कार्ड दिए गए धीरे धीरे विद्यालय के अन्य अध्यापक भी इस मिशन के सहभागी बन गए और स्कूल की छात्र संख्या दो गुना बढ़ गई. प्राइवेट स्कूल से बच्चे सरकारी स्कूल में दाखिला लेने लगे।  स्थितियां वही थीं संसाधन भी वही थे बस  काम करने का तरीका अलग था आज स्कूल में रौनक है और हर अध्यापक को मानसिक संतोष। हर शनिवार आशुतोष अपने बच्चों को लैपटॉप पर कोई मोटिवेशनल वीडियो दिखाना नहीं भूलते और यही तरीका उन्हें अपने में अलग बनाता है।
       ये उदाहरण मात्र बानगी भर हैं ऐसे न जाने कितने उदाहरण हमारे आस पास मौजूद हैं जहाँ उम्मीद की किरणें बरकरार हैं।  लेकिन इन सबके बावजूद एक कड़वा सच यह भी है कि बाजार की दौड़ में अधिकांश सरकारी स्कूल पीछे छूटते जा रहे हैं और यदि इन्होने अपनी गति नहीं बढ़ाई तो इन स्कूलों को बंद होने से रोका नहीं जा सकता।  जब छात्र ही नहीं होंगे तो स्कूल, मास्टर इन सब पर जनता का पैसा सरकार क्यों लगाएगी ?
सरकारी स्कूल की छवि के बारे में मेरे अत्यंत मृदुभाषी प्रिंसिपल मित्र उमेश तिवारी मजाकिया  लहजे में कहते हैं कि ट्रेन  या बस में जैसे ही लोगों को पता चलता है कि ये सरकारी टीचर हैं लोग सरकारी स्कूल और उनके मास्टरों को कोसने लगते हैं वो हँसते हुए कहते हैं कि मुझे  पहचान छुपा के चलना पड़ता है कि कहीं गुस्से में लोग मारने न लगें।
        मेरी समझ से मोटे तौर पर सरकारी स्कूलों को शिक्षा जगत में अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए दो तरह के बदलाव की जरूरत होगी पहली भौतिक संसाधनों की जिसमे बच्चों के बैठने के लिए कुर्सी, मेज, छत से लेकर पढाई के लिए चमकते ब्लैकबोर्ड , बल्ब, पंखा  लैपटॉप, टीवी सब शामिल है  वहीं दूसरी तरफ पढाई की गुणवत्ता और तौर तरीके भी हमे बदलने होंगे यदि पेरेंट्स अपने बच्चे को अंग्रेजी पढ़ाना चाहता है मॉडर्न बना देना चाहता है तो हमे उसकी मांग पर ध्यान देना होगा यदि टाई लगाने से बच्चे का लुक मॉडर्न होता है तो सरकारी स्कूल में टाई क्यों नहीं ? हाँ ये बात जरूर है कि सिर्फ टाई से ही सब कुछ नहीं बदलेगा।  बहुत से लोग इस बात का इंतज़ार करेंगे कि पहले भौतिक संसाधन बढ़ जांय तब हम कुछ करें लेकिन भौतिक संसाधन उस  तेजी से नहीं बदलते जिस तेजी से शिक्षा की  गुणवत्ता को बदला जा सकता है सरकारी स्कूलों में ऐसे स्कूल जहाँ हर क्लास के लिए एक मास्टर हो उनकी संख्या हर ब्लॉक  में इतनी कम है कि उन्हें उँगलियों पर गिना जा सकता है हमे ये भी पता है कि ये कमी फ़िलहाल इतनी जल्दी पूरी नहीं होगी इसी तरह कुर्सी ,मेज भी धीरे धीरे ही होगी हाँ ब्लैकबोर्ड को आज ही चमकदार बनाया जा सकता है।
       इटावा के एक कान्वेंट स्कूल के प्रिंसिपल और मेरे मित्र  डॉ आनन्द का मानना है कि बहुत से नए टीचर जो प्राइवेट स्कूल से सरकारी टीचर के रूप में भर्ती हुए उनके अनुभव को लेकर सरकारी स्कूल फिर आगे बढ़ सकते हैं अच्छे अनुभव वाले ऐसे टीचर्स को मास्टर ट्रेनर के रूप में लगाया जा सकता है बहुत से पुराने टीचर्स आज भी उदाहरण व् प्रेरणा स्रोत हैं।  डॉ आनंद प्राइवेट और सरकारी स्कूलों के इंटरैक्शन पर भी जोर देते हैं लेकिन समस्या ये है कि दोनों की अकड़ एक दुसरे से मिलने नहीं देती।यदि कान्वेंट स्कूल किसी एक दो ग्रामीण सरकारी स्कूल को गोद ले लें तो नज़ारा ही बदल सकता है लेकिन ये हिम्मत सबमें नहीं होगी  .मीडिया हाउस भी आलोचना के बजाय कुछ सरकारी स्कूलों को गोद ले सकते हैं इससे भी उनकी टी आर पी बढ़ेगी।
       बहुत से युवा शिक्षकों ने स्कूल की कई जरूरतों को समाज से लेकर पूरा किया।  समाज का विश्वास यदि जीत लिया जाय तो समाज मदद भी करता है लेकिन इसके लिए कुछ कर गुजरने की ललक भी वो देखना चाहेगा। मै उन अध्यापकों की बात नहीं करता जो जिंदगी जी चुके हैं और जिन्हे सिस्टम और समाज से ढेर सारी शिकायतें हैं और जिन्हे सिस्टम ढो रहा है , लेकिन मेरा मानना है कि आज का सरकारी शिक्षक जो कान्वेंट शिक्षकों से कहीं ज्यादा योग्य है इस बदलाव का सूत्रधार जरूर बन सकता है ।  बहुत से लोग ताने मारेंगे -टांग खीचेंगे लेकिन शायद उनका ये पागलपन वेंटिलेटर पर चल रहे सरकारी स्कूलों में नई जान फूंक दे।


Friday, March 17, 2017

स्कूल और हम

         शिक्षा पर जैसे ही बात शुरू होती है हम अचानक से सजग हो जाते हैं क्योंकि हमे पता है कि देश के विकास व् सभ्यता की चाबी यही कहीं है शिक्षा में हम बदलना तो बहुत कुछ चाहते हैं लेकिन फिर सोचते हैं कि सब कुछ सरकार करे हमारे अकेले से क्या होगा।  एक सच्चाई ये भी है कि जितने प्रयोग शिक्षा के क्षेत्र में हुए उतने शायद ही कहीं हुए हों हर एक को अपना प्रयोग अनूठा लगता है।हमारी उम्मीद से जो अलग प्रयोग होता है वो हमे पसंद नही आता इस बदलाव की तमन्ना में एक सत्य यह है कि सरकारी स्कूल बाजार की दौड़ में पिछड़ रहे हैं और आम जनमानस की आलोचना का शिकार हो रहे हैं।
          इससे पहले कि सरकारी और प्राइवेट स्कूल की बात की जाय उनकी संरचना को समझना जरुरी हो जाता है।   हिंदुस्तान में स्कूलों  के मुख्यतया तीन  रूप हैं पहला वो स्कूल जो पूरी तरह से सरकारी फंड पर आश्रित और सरकारी नियंत्रण में हैं ये  सरकारी स्कूल के नाम से जाने जाते हैं.  दूसरा वे स्कूल जो आंशिक रूप से सरकार पर आश्रित हैं जैसे वेतन और अनुदान आदि वे स्कूल सहायता प्राप्त स्कूल के नाम से जाने जाते हैं. तीसरी श्रेणी में वे स्कूल आते हैं जो सरकार से कोई भी आर्थिक सहायता नही लेते और प्राइवेट और कान्वेंट  नाम से जाने जाते हैं।  आज़ादी के बाद अस्सी के दशक तक जिन स्कूलों का दबदबा रहा वे पहली दो श्रेणी के स्कूल थे यानि सरकारी और अर्द्धसरकारी जिन्हें हम आगे सरकारी स्कूल के नाम से संबोधित करेंगे ।  धीरे -धीरे इन प्राइवेट और कान्वेंट स्कूलों का चलन बढ़ा और देखते देखते इन स्कूलों ने शिक्षा के नए नए आयाम स्थापित कर दिए जिसका परिणाम यह रहा कि जो व्यक्ति भी सक्षम था उसने अपने बच्चों की शिक्षा के लिए इन स्कूलों को प्राथमिकता दी।गरीब से गरीब व्यक्ति भी कोशिश करता है कि उसका बच्चा कान्वेंट में पढ़े।  कान्वेंट और प्राइवेट स्कूलों की लॉबी ने सरकारी स्कूलों को शिक्षा की गुणवत्ता के दौर में बहुत पीछे छोड़ दिया। धीरे -धीरे  सरकारी स्कूल गांव, गरीब और लड़कियों के स्कूल बन कर रह गए।
          आप सोच रहे होंगे कि प्राइवेट और कान्वेंट स्कूलों ने बहुत अच्छे टीचर रखे होंगे तो सच्चाई इसके बिलकुल उलट मिलेगी।  सरकारी स्कूलों के  टीचर प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले ज्यादा योग्य थे और आज भी हैं  और उन्हें कई परीक्षाओं से गुजरने के बाद अपनी योग्यता के बल पर नौकरी मिलती है । अगर सरकारी स्कूलों के टीचर्स के वेतन की तुलना करें तो उनके मुकाबले प्राइवेट स्कूल के  टीचर मात्र 10 से 30 प्रतिशत वेतन पाकर अपने छात्रों को पढ़ाते है लेकिन ये बात भी सही है कि वे अपने छात्रों को जी जान से पढ़ाते  हैं  क्योंकि वे जानते  हैं  कि यदि रिजल्ट खराब आया तो उनकी  छुट्टी कर दी जाएगी। प्राइवेट और कान्वेंट स्कूलों में इस बात की होड़ लगी रहती है कि किसका रिजल्ट सबसे अच्छा रहा इसके लिए उन्हें जो भी तरीका अपनाना पड़े वो अपनाते हैं जैसे वो उन बच्चों को अपने स्कूल में दाखिल ही नही करते जो कमजोर होते हैं, केवल वही कमजोर बच्चे दाखिला पाते हैं जिनके मां बाप हज़ारों लाखों का डोनेशन दे सकते हैं स्कूल वालों को पता होता है कि ये ट्यूशन पढ़ के पास तो हो ही जायेगा । इनकी फीस को नियंत्रित करने वाला आज तक कोई  कानून नही बन सका जो बना भी वो गोल मोल था। बच्चों के एडमिशन के लिए माँ बाप का इंटरव्यू पहले ही ले लिया जाता है।              अब नज़र डालते हैं सरकारी स्कूल पर जो किसी भी बच्चे का एडमिशन मना नही कर सकता किसी तरह का डोनेशन नही ले सकता उसके पास पढ़ाने के लिए अच्छे से लेकर डग्गामार हर तरह का लॉट होता है । एक तरफ कान्वेंट स्कूल में यदि बच्चा दो दिन पढ़ने न आये तो पैरेंट्स को नोटिस आ जाता है वही सरकारी स्कूल में घर से बुलाने पर भी बच्चे  नही आते -मास्टर उन्हें  फेल तो कर ही नही सकता।  अब ये बिना स्कूल आये प्रोमोट किए  छात्र अगली कक्षाओं का रिजल्ट बिगाड़ देता है।  कान्वेंट स्कूल सौ प्रतिशत रिजल्ट के लिए हर हथकण्डे अपनाते हैं ये हथकंडे क्या होते हैं आप बेहतर जानते हैं।
           कुल मिलाकर एक तरफ अमीर स्कूल हैं दूसरी तरफ गरीब स्कूल ,अमीर स्कूल के बच्चे अमीर हैं और मास्टर गरीब (प्रबंधक व् प्रिंसिपल को छोड़कर ) वहीं गरीब स्कूल के बच्चे गरीब हैं और मास्टर अमीर।  इन दोनों के बीच लड़ाई है परफॉरमेंस की।  एक की रोजी रोटी रोज की मेहनत  पर है दुसरे की मिड डे मील का रजिस्टर भरने पर।  एक ए सी बाथरूम का आदी है वहीं दूसरे के लिए बाथरूम ही नही है। हमारी अपेक्षाएं सरकारी से ज्यादा हैं क्योंकि उनके वेतन प्राइवेट से ज्यादा हैं हम सरकारी स्कूल को कोसते हैं- कोसते हैं और सिर्फ कोसते हैं मीडिया हाउस की टी आर पी बढ़ाने का ये सबसे आसान जरिया बन चुका है कैमरे के सामने स्कूल की मदद के बजाय उन्हें नीचा दिखाया जाता है , सरकारी स्कूलों को कान्वेंट लॉबी  फूटी आँख नही देखना चाहती जितने पैरेंट्स  सरकारी स्कूल से अपने बच्चे को  निकालते हैं वे उन्हें कान्वेंट में दाखिल करा देना चाहते हैं वे कान्वेंट स्कूल को हर महीने हज़ारों की फीस देने को तैयार हैं लेकिन सरकारी स्कूल में चाक का डिब्बा गिफ्ट करने को तैयार नही हैं।  ये हाल सिर्फ पेरेंट्स का नही है ये हाल हम सबका है जो सरकारी स्कूल से पढ़  कर निकले हैं हमारी उम्मीदें इस मामले में दिवा स्वप्न जैसी हैं हम सरकारी स्कूल के आलोचक बन कर आनन्द की अनुभूति करने लगे हैं किसी बच्चे को रोज रोज हतोत्साहित किया जाय तो उसे अपने ऊपर शंका होने लगती है सरकारी स्कूल इतनी आलोचनाओं के बावजूद गरीब तबकों और लड़कियों के लिए आशा के केंद्र आज भी हैं जहाँ 100-200  रूपये सालाना भरकर वे अपनी पढाई कर सकते हैं।  जिस संस्था या संगठन को आम जनमानस का समर्थन नही मिलता उसे ज्यादा दिन जिन्दा रहना मुश्किल होता है सरकारी स्कूल कुछेक अपवादों को छोड़कर वेंटीलेटर पे जा चुके हैं कई सरकारी स्कूलों को यह कह दिया गया है कि अब वे नए एडमिशन न लें।सरकारी स्कूलों से पढ़े बड़े बड़े ओहदेदारों की कलम से जब ऐसे आदेश जारी होते हैं तो लगता है कि  कान्वेंट लॉबी हर स्तर पर हावी है सरकारी स्कूल से पढ़े हम आप तमाशबीन बन कर रह गए हैं इन  दम तोड़ते स्कूलों  को मदद करने का ख्याल यदि आ जाय तो शायद सरकारी स्कूल में की गई पढाई का कर्ज उतर जाय. फ़िलहाल मदद करें या न करें लेकिन आलोचक भीड़ का हिस्सा न बनें सिर्फ इतना अहसान शायद इन गांव ,गरीब  और लड़कियों के  स्कूल के पर्याय वाची बन चुके  स्कूलों में फिर से जिंदगी की उम्मीद जगा दे। -(डॉ ललित नारायण मिश्र )

Thursday, December 22, 2016

किसान दिवस के बहाने -

23 दिसम्बर किसान दिवस है  इस  अवसर पर आइये कम से कम एक दिन किसान की बात कर ली जाय वही किसान  जो मीडिया और सोशल मीडिया दोनों में न जाने किस हाशिये पर पहुंच गया है।  किसान को  इस बात की चिंता भी नही है कि शासन या सत्ता उसके बारे में कितना  चिंतित हैं बस उसका संघर्ष ऐसा है जो रोज रोज का है चाहे वह बाढ़ हो या सूखा या फिर कीड़ों और रोगों का आक्रमण । फसल बच गई तो खुश न बची तो पेट भरने का संघर्ष तो  उसकी नियति है ही . ये पेट भरने का संघर्ष जीवन का संघर्ष भी कहा जा सकता है ।  हिंदुस्तान में लगभग 58 % लोग  खेती पर निर्भर हैं ये लोग  किसान हैं या उनके परिजन या खेतिहर श्रमिक जिनकी जिंदगी खेती के भरोसे ही चलती है। आज भी खेती एक बहुत बड़ी आबादी को  रोजगार देती है। खेती की कम उपज का बहुत बड़ा कारण सिंचाई के साधनों का आभाव है। खेती का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी असिंचित है आंकड़ों के अनुसार हिंदुस्तान में लगभग 36 % खेती ही सिंचित है विडम्बना यह है कि आज़ादी के बाद ये आंकड़ा बहुत ज्यादा बदला नही जा सका । देश में खेती योग्य जमीन की उपलब्धता लगातार घट रही है। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रति व्यक्ति  जमीन की उपलब्धता 2013 में मात्र  0.12  है. ही रह गयी है जो 1961 में 0.34 है. हुआ करती थी ।  कहने का मतलब यह है कि जनसंख्या बढ़ी किन्तु खेती योग्य जमीन कम होती गयी यदि यही गति रही तो इसका दुष्परिणाम ये होगा कि भविष्य में  खाद्यान्न सहित दलहन व् तिलहन आदि के लिए हमें दूसरे देशों पर निर्भर हो जाना पड़ेगा।  अब प्रश्न यह है कि क्या भारत का किसान इससे निजात दिलवा सकता है तो उत्तर हाँ में है बशर्ते उसे देश की नीति में प्राथमिकता पर लेना होगा जिसे हमने हाशिये पर छोड़ रखा है  उसे सिंचाई के साधन देने होंगे अच्छे बीज, उन्नत तकनीक देने होंगे ,जंगली जानवरों  से सुरक्षा प्रदान करनी होगी और उसके उत्पादों को उपभोक्ता द्वारा दिए जा रहे मूल्य के आस -पास पहुंचा देना होगा। हम इस बात पे खुश हो सकते हैं कि हिंदुस्तान की जीडीपी में उद्योग का और सेवा क्षेत्र का हिस्सा बढ़ रहा है और हम विकसित देश की तरफ बढ़ रहे हैं लेकिन क्या ये सब खेती की कीमत पर हमें  मंजूर है ? खेती का हिंदुस्तान की जीडीपी में हिस्सा पिछले छह दशक में लगभग 80 % घटा है और वर्तमान में कुल जीडीपी का  13 .9% ही रह गया है।  एक महत्वपूर्ण पहलू और है कि हिंदुस्तान का किसान जितना उगाता  है उसका लगभग 40 % नष्ट हो जाता है यू एन डी पी की रिपोर्ट के अनुसार भारत में उतना गेहूँ नष्ट हो जाता है जितना ऑस्ट्रेलिया में पैदा होता है कुल मिलाकर खेती की उपज का एक लाख करोड़ रूपये का नुकसान प्रति वर्ष इस देश में हो जाता है जो बहुत आसानी से गोदाम ,प्रसंस्करण केंद्र आदि बना कर रोका जा सकता है . इक्कीसवीं सदी में हिंदुस्तान की खेती ऐसे दौर से  गुजर रही है जहां एक तरफ दाल बाहर से आयात की जा रही है तो वहीं मोटे अनाजों की किस्में लुप्त होती जा रही हैं , उपभोक्ताओं को अपने खाद्य तेल में मिलावट  का सन्देह है वहीं किसान का तिलहन देश में कोई नही पूछ रहा ।  किसानों को अपनी उपज औने पौने दामों पर बेचनी पड़ रही है आज भी  उपभोक्ता जो मूल्य दे कर अनाज सब्जी फल आदि खरीद रहा है उसका लगभग आधे से भी कम किसान को मिल पा रहा है बाकी बिचौलियों की और मोटे सेठों की जेब में जा रहा है।  उदाहरण के लिए जो चावल 50 रूपये प्रति किलो  में उपभोक्ताओं को बेचा जा रहा है वह लगभग 18-20 रूपये प्रति किलो में लोकल आढ़तिये द्वारा किसान से खरीदा गया होता है यही हाल दाल तिलहन ,सब्जी और फलों का भी है।  उपभोक्ता और किसान का सीधा लिंक जब तक नही होगा ये समस्या बनी रहेगी। खेती के लिए  बड़े बड़े कर्ज और उन्हें खेती से न चुका पाना ये किसान की नियति हो गयी है।  सूखा ,बाढ़ ,रोग, कीड़े और जंगली जानवर सब किसान को ही झेलने हैं यही कारण है कि किसान आत्महत्या के लिए विवश हो रहा है।  किसानों की बीमा की प्रक्रिया और उनमें की जाने वाली औपचारिकताएं इतनी ज्यादा है कि बहुत से किसान इससे दूर भागते हैं । आज जरूरत इस बात की है कि खेती और किसानों के लिए सहज और सुगम नीति बनाई जाय । खेती से जुड़े उद्योग उन्ही निकट वर्ती क्षेत्रों में लगाए जांय जहां जो फसल पैदा हो रही है।  जब तक खेती और किसान देश की शीर्ष प्राथमिकता में नही आते न  देश का उद्धार सम्भव है न ही किसान का ।  -डॉ ललित नारायण मिश्र 

Wednesday, December 21, 2016

Online Voting-

# Online Voting कैशलेस इंडिया और डिजिटल इंडिया के साथ ऑनलाइन वोटिंग की बात होनी चाहिए परिवर्तन चाहने वाली युवा पीढ़ी का मतदान प्रतिशत अपने आप बढ़ जाएगा ।  नोट पे रिस्क ले सकते हैं तो वोट पे क्यों नहीं ?