मन की गति से शरीर में परिवर्तन आते हैं .विभिन्न रोगों की उत- पत्ति में भी मन का हाथ होता है .मन के विचार पकड़ में कम आ पाते हैं जिन्दगी यूँ ही बीतती जाती है . मन पे लगाम लगा लेना एक निरंकुश हाथी को नियंत्रित करने जैसा है .मन झुनझुना पकड़ा -पकड़ा के चकमा देता है कि ये सही है या वो सही है. इस संसार में सब कुछ नियंत्रित करने वाली पराशक्ति है जो जिसको जब जैसा बनाना चाहे बनाती है .उस पराशक्ति का प्रक्षेपण मन में होता रहता है मन के विचारों को नियंत्रित कर उस पराशक्ति से संवाद बनाया जा सकता है.
Friday, April 5, 2013
Thursday, March 7, 2013
Friday, February 22, 2013
Thursday, January 31, 2013
मार्निंग वाक-
हिंदुस्तान में मार्निंग वाक पर निकलने वाली जनसँख्या इतनी बड़ी हो चली है कि यदि यह जनसँख्या निकटवर्ती किसानों के खेतों में कुछ काम कर अपनी चर्बी घटाए तो देश का उत्पादन कई गुना बढ़ सकता है .-सत्यमेव जयते
Friday, January 11, 2013
मुक्ति से गहरा बंधन का नाता-
सोचता हूँ मुक्त हो जाऊं
चाहता हूँ रिक्त हो जाऊं
दुखों से पार
उलझनों के पार
हर जगह जहाँ जाता हूँ आवाजें ही आवाजें पाता हूँ
कभी बाहर की आवाजों से घबराता हूँ
कभी अन्दर की आवाजों को दबाता हूँ
मैं ढलता जाता हूँ उसी तरह जिस तरह दुनिया चाहती है
दुनिया की नज़रों में अपनी अहमियत बनाये रखने को
मैं अपने को छोड़ता जाता हूँ -मोड़ता जाता हूँ
सारी शर्तों को मानने के बाद भी आवाजें पीछा नहीं छोड़तीं
पलट कर दुनिया को जवाब देने को जी चाहता है
फिर सोचता हूँ -
इस दुनिया ने ही तो मुझे दुनिया दी
हवा,पानी, निवाले, खुशी-गम, प्यार -तकरार
इसी मिट्टी के तो हैं जिस मिट्टी से हम हैं
मिट्टी से मिट्टी का पुराना नाता है
इसलिए यह जग लुभाता है
बार -बार हर बार लौट-लौट आता है
मुक्ति से ज्यादा गहरा बंधन का नाता है
मुक्ति से ज्यादा गहरा बंधन का नाता है -ललित
चाहता हूँ रिक्त हो जाऊं
दुखों से पार
उलझनों के पार
हर जगह जहाँ जाता हूँ आवाजें ही आवाजें पाता हूँ
कभी बाहर की आवाजों से घबराता हूँ
कभी अन्दर की आवाजों को दबाता हूँ
मैं ढलता जाता हूँ उसी तरह जिस तरह दुनिया चाहती है
दुनिया की नज़रों में अपनी अहमियत बनाये रखने को
मैं अपने को छोड़ता जाता हूँ -मोड़ता जाता हूँ
सारी शर्तों को मानने के बाद भी आवाजें पीछा नहीं छोड़तीं
पलट कर दुनिया को जवाब देने को जी चाहता है
फिर सोचता हूँ -
इस दुनिया ने ही तो मुझे दुनिया दी
हवा,पानी, निवाले, खुशी-गम, प्यार -तकरार
इसी मिट्टी के तो हैं जिस मिट्टी से हम हैं
मिट्टी से मिट्टी का पुराना नाता है
इसलिए यह जग लुभाता है
बार -बार हर बार लौट-लौट आता है
मुक्ति से ज्यादा गहरा बंधन का नाता है
मुक्ति से ज्यादा गहरा बंधन का नाता है -ललित
Wednesday, December 19, 2012
Sunday, November 4, 2012
लौटने का इंतज़ार-
जो पन्ने नज़रों से गुज़रे थे कभी
दुबारा पलटे न जा सके
मै यह सोच कर उन्हें सहेजता रहा कि कभी वक़्त मिलेगा
उनसे रू -बरू होने का
खुद के खोने का .
इसी ख़याल में अक्सर खो जाता हूँ
कि कल जरूर बैठूँगा उनके पास
बिखरी इबादतों को समेट कर उन्हें खुश कर लूँगा
जिन्दगी जी लूँगा .
मैं उन तक पहुँच तो जाता हूँ पर पकड़ नहीं पाता .
रोज़ देखता हूँ आलमारियों से कोई शिकायत करता है
पूछता है मेरे लिए वक़्त कब आएगा?
मैं जिन्दगी की तेज़ रफ़्तार में फिर से कल मिलने की बात कह के निकल जाता हूँ .
वो किताब मेरे लौटने का इंतज़ार करती है
वो जिन्दगी मेरे लौटने का ऐतबार करती है .-ललित
दुबारा पलटे न जा सके
मै यह सोच कर उन्हें सहेजता रहा कि कभी वक़्त मिलेगा
उनसे रू -बरू होने का
खुद के खोने का .
इसी ख़याल में अक्सर खो जाता हूँ
कि कल जरूर बैठूँगा उनके पास
बिखरी इबादतों को समेट कर उन्हें खुश कर लूँगा
जिन्दगी जी लूँगा .
मैं उन तक पहुँच तो जाता हूँ पर पकड़ नहीं पाता .
रोज़ देखता हूँ आलमारियों से कोई शिकायत करता है
पूछता है मेरे लिए वक़्त कब आएगा?
मैं जिन्दगी की तेज़ रफ़्तार में फिर से कल मिलने की बात कह के निकल जाता हूँ .
वो किताब मेरे लौटने का इंतज़ार करती है
वो जिन्दगी मेरे लौटने का ऐतबार करती है .-ललित
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