Tuesday, May 10, 2011

हम जहाँ से चले थे वहीं आ गए -

आज के हालात पर -
ऐसा मौसम है हम बोल सकते नहीं
बन विरोधी भी मुंह खोल सकते नहीं
फ़ैल फिर से है शोषण का कोहरा रहा
जैसे इतिहास अपने को दोहरा रहा
प्रष्ट जो खुल रहे सनसनी खेज हैं
तब थे गोरे तो अब काले अंग्रेज हैं
यानी फिर से गुलामी के घन छा गए
हम जहाँ से चले थे वहीं आ गए

सोच कर हम चले थे सबेरा हुआ
किन्तु कुछ पग चले तम घनेरा हुआ
रौशनी झोपडी से बहुत दूर है
वह अंधेरों में जीने को मजबूर है
जिनके हाथों में सारे ही अधिकार हैं
सूर्य के क़त्ल के वे गुनहगार हैं
सच तो ये है वही रश्मिरथ पा गए
हम जहाँ से चले थे वहीं आ गए - कवि कमलेश शर्मा 9412660893
आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।

फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।-dinkarji

Sunday, April 10, 2011

bhrashtachar babua dheere-dheere jayee

भ्रष्टाचार बबुआ धीरे धीरे जाई .
रोई कै जाई गाय कै जाई.
बड़े बड़े सहिबन कै निंदिया उडाई.
भ्रष्टाचार बबुआ धीरे धीरे जाई.
लाठी से जाई डंडा से जाई
अन्ना के धरना से जाई.
भ्रष्टाचार बबुआ धीरे धीरे जाई .
संसद से जाई मनसद से जाई
बबुवन कै चैन उड़ाई
भ्रष्टाचार बबुआ धीरे धीरे जाई.
घरवा से जाई दुवरवा से जाई
घूरे मा जा के समाई .
भ्रष्टाचार बबुआ धीरे धीरे जाई .
मनुवा से जाई जेहन्वा से जाई
जरि से उछिंद होई जाई
भ्रष्टाचार बबुआ धीरे धीरे जाई
देसवा से जाई परदेसवा से जाई,
जा के जहन्नुम समाई.
भ्रष्टाचार बबुआ धीरे धीरे जाई .
तंत्र से जाई मंत्र से जाई सँचवा कै बाजी दुहाई .
भ्रष्टाचार बबुआ धीरे धीरे जाई .
-सत्यमेव जयते . -Lalit and ratnesh

Wednesday, March 2, 2011

Indian rail and consumer right

Let us talk about general coach of Indian rail-
you pay full money for travelling but often you will not get seat and u may experience too much pain Why?
Is it not your right to get seat and comfortable journey after full payment of fare?
Is indian railway not comes under service provider?
Will you tolerate if a hotel do not provide u a room after full payment?
or
a shopkeeper provide you a bad quality product or service?

If no Then why we tolerate voilation of our consumer right in railway? Bharteey Railway ne Paisa liya hai to seat kaun dega ....America wale?
Raise hands for ur right of service whether in railway or elsewhere where u pay for service.-Satyamevjayate

Sunday, January 23, 2011

join hands against corruption

Dear sir/Madam,

Satyamevjayate

Our first aim was RTI(Right to information) to make corruption free India .Our next target is to get Right to implementation(RTI) because Right To Information do not ensure remedy.In right to Implementation our target is to get right of public to get good quality work/action and lawful implementation within a time framework from government agencies and politicians.In this way public will get remedy if neded.This will be next battle to make corruption free India after right to information.
( mishralnm@yahoo.com)

yours'

Dr.Lalit Narayan Mishra

First national RTI award winner(best PIO)2009
Deputy Collector (SDM)Uttarakhand

Saturday, October 30, 2010

itihas mera

जब जीता खुद से ही जीता जब हारा खुद से हार गया
जंगों को जीता कभी- कभी मैं जीती बाजी हार गया
संकल्पों से ही नाता है हमने न चुने विकल्प कभी
जिसने जैसा चाहा उसने बस वैसा अर्थ निकाल गया.
औरों में दम था कहाँ डुबा देते जो मेरी कश्ती को
डूबे हम वहीं जहाँ अपनी मेहनत का पानी सूख गया
गिनती थी कभी शरीफों में चर्चा में हम ही रहते थे
अब खुद में ही आवारा हैं जब से घर-आँगन छूट गया.
इतिहास अनोखा है अपना कागज में कैद नहीं होता
अम्बर के पन्नों में कोई मेरी तस्वीर उतार गया.-ललित

Friday, October 8, 2010

vatan kee aawaj

खामोश वतन कुछ कहता है कुछ प्रश्न सभी से करता है
जिस दीपक से दुनिया रौशन वो शमां ढूंढता रहता है
किसने सूरज का रथ रोका क्यों घोर अँधेरा कायम है ?
घर में ही कुछ गद्दार छिपे उस ओर इशारा करता है
कुछ काट रहे उस बरगद को जिस से वो छाया पाते थे
सौगात भरे इतिवृत्तों का सन्दर्भ सुनाता रहता है
सब के सब मगन महोत्सव में बुनियादों का दुःख कौन सुने
सूनी आँखों के सपने में उम्मीद जगाता रहता है
सिसकन क्यों उठी कंगूरे से मीनारों का दम सिहर गया
कुछ सडन भरे अखबारों का सन्देश सुनाता रहता है
अर्जुन संग कृष्ण नहीं रथ पर गीता का सबक सुनें किस से
कौरव संग खड़े पितामह हैं ये व्यथा बताता रहता है -ललित