Wednesday, May 4, 2022

 भगवान कौन :-


ये सबको पता है कि  दिग्गज क्रिकेटर चेतन चौहान जी कोरोना से लड़ाई हार गए लेकिन क्या हमें    पता है कुछ लड़ाई समाज भी हार रहा है खासकर भारतीय समाज ।

  

   अजीत सिंह जी जो उत्तर प्रदेश सरकार में एक उच्च स्तर के अधिकारी हैं उन्होंने अपनी फेसबुक वाल में चेतन चौहान के साथ की गई अभद्रता पर व्यथित होकर  कुछ लिखा तो एक डॉक्टर साहब ने लिखा डॉक्टर के लिए "मरीज मरीज होता है" यहां तक तो बात ठीक थी लेकिन कई अन्य लोगों ने इस बात को लिखने में हिम्मत दिखाई कि उनके साथ डॉक्टर का व्यवहार बहुत गंदा था ।

 

 ये बात सामान्य नहीं है लेकिन इसे समझना इतना आसान भी नहीं है ये जो कुछ मै लिखने जा रहा हूं वो भी हिम्मत करके क्योंकि मुझे भी डॉक्टर खासकर डॉक्टर दोस्तों से दुश्मनी मोल नहीं लेनी है । इस पूरी डॉक्टर की फौज में कई तरह के डॉक्टर होते हैं एलोपैथी वाले अलग ,आयुर्वेद वाले अलग , होम्यो वाले अलग वगैरह वगैरह ।

  

 प्रायः जिन डॉक्टरों पर रूखे और गंदे व्यवहार का आरोप सामने आया उनकी पढ़ाई एलोपैथी वाली थी यानी एमबीबीएस । पीजीआई में भी चेतन जी के साथ वहीं कनेक्शन मिला । ऐसा क्यों होता है उसको जानने के लिए कई डॉक्टर्स से जब मैंने यह जानना चाहा कि क्या आपको ये भी पढ़ाया जाता है कि मरीज से किस तरह का व्यवहार किया जाय तो एमबीबीएस वालों का जवाब था  " नहीं" "हम तो ट्रेनिंग में ही सीखते हैं क्या करना है जैसा सीनियर करते हैं वैसा हम भी करते हैं ।" 

   यही बात आयुर्वेद के डॉक्टर से जब पूछी गई तो उन्होंने बताया कि हमारे पहले पाठ्य क्रम में ही सुश्रुत का वह श्लोक पढ़ाया जाता है जिसमें चिकित्सक को पहली शर्त ही यही दी जाती है कि वह रोगी से पुत्र वत व्यवहार करे , अर्थात जिस तरह छोटे शिशु को पिता पालता है ठीक उसी तरह चिकित्सक को रोगी से व्यवहार करना है ये स्नेह भी तो उपचार करता है न। होम्योपैथिक चिकित्सक आधे घंटे मरीज से बात करने में लगाता है जिससे मरीज का भरोसा बढ़ जाता है । एलोपैथी में यही कमी रह जाती है जैसे बायोलॉजी के स्टूडेंट को डिसेक्शन करते करते मेंढक में जीव नजर आना बन्द हो जाता है वैसे ही इन डॉक्टर को आदमी में आदमी नजर आना बन्द हो जाता है। बस अंतर यहीं से आरम्भ हो जाता है । सारा कोर्स लगभग वही लेकिन सोच  का अंतर बड़ा अंतर पैदा कर देता है । 


    ये जो दोनों कोर्स में सोच और पढ़ाई का अंतर है इसे ही परवरिश या संस्कार कहते हैं अगर चेतन चौहान जी के साथ वो  वाकया हुआ तो उसमें डॉक्टर से ज्यादा उस माहौल की गलती है जहां उन्हें यह घोट के पिलाया और सिखाया जाता है कि तुम भगवान हो और मरीज को जिस तरह चाहो व्यवहार करो ।आखिर जो पैसा लेकर अपनी सेवा दे रहा वो भगवान कैसे हुआ । भगवान तो मरीज हुआ जिसके आने से उसे रोजी रोटी मिली । जिसके आने से उसके फाइव स्टार अस्पताल चल रहे ।


  मेडिकल प्रोफ़ेशनल खासकर एमबीबीएस जिस तरह व्यवसाय पर उतारू हो गए हैं उस दौर में वो भगवान के दर्जे से बनिया के दर्जे पर आ गए हैं फुल बिजनेस , रूड बिहैव ,ये तो बानगी हैं अगर इनकी परवरिश ऐसे ही रही तो आगे बहुत कुछ देखने को मिलेगा। विदेश के लोग तो इसके आदी हैं पर  भारतीय समाज अभी नहीं हुआ ।

 जिस तरह कॉन्वेंट वालों से मां बाप की सेवा नहीं होती उसी तरह एलो. वालों से मरीज की इज्जत नहीं होती । क्योंकि भगवान को क्या पड़ी किसी को सम्मान देने की ।

-( साभार जेएमडी)

Thursday, April 14, 2022

सतुआ संक्रांति-

 सतुआ संक्रांति 

      जिस तरह मकर संक्रांति पूरे भारत में धूम धाम से मनाई जाती है उसी तरह जब सूर्य देव  मेष राशि में प्रवेश करते हैं तो सतुआ संक्रांति मनाई जाती है।  माना जाता है कि इस दिन से शुभ कार्य प्रारम्भ हो सकते हैं।  भारतीय जन जीवन में फसलें त्यौहार और त्यौहार फसलों के पकने से जुड़े हुए हैं। फसलें मौसम आधारित हैं और मौसम सूर्य और उससे उत्पन्न ताप से प्रभावित होता है इस तरह सूर्य देव प्रकृति और जीवन की शैली को नियंत्रित करते रहते हैं. 

       सतुआ संक्रांति उत्तर भारत का प्रसिद्ध त्यौहार रहा है फ़िलहाल आधुनिक जीवन शैली में यह गांव और लोक मान्यताओं में अब भी धूम धाम से मनाया जाता है। सतुआ या सत्तू खासकर जौ और चने को भूनकर और पीसने के बाद  मिलाकर बनाया जाता है।  कुछ जगह दोनों को अलग -अलग ही रखते हैं।  सत्तू के व्यंजन सदियों से लोकप्रिय रहे हैं जिनमें से बाटी या लिट्टी  सर्व सुलभ है।  कहते हैं कि लम्बी दूरी की यात्रा के लिए एक ऐसे भोजन की तलाश थी जो धूप ,गर्मी ,बरसात की नमी से  ख़राब न हो और कई दिनों तक चले।  सत्तू इस प्रयोग की तलाश का आविष्कार कहा जा सकता है जिसको जैसे चाहो वैसे प्रयोग में लाओ।  प्यास लगे ,लू लग जाय तो घोल के पी लो इससे बढ़िया कोल्ड ड्रिंक नहीं , भूख लगे तो पानी में मिक्स कर खा लो नूडल्स  से भी कम समय में तैयार है और अगर समय हो तो लिट्टी बनाकर या पूड़ी में भरकर  खाया जा सकता है गारंटी के साथ घंटों आपको भूख  नहीं लगने देगा। 

इस देशी खाद्य पर हुए रिसर्च ने इसको बेहतरीन फ़ास्ट फ़ूड माना है कुछ न्यूट्रिशनिस्ट इसे सुपर फ़ूड कहने से नहीं चूकते।  इंस्टैंट एनर्जी के साथ साथ  प्रोटीन , कैल्शियम, मैग्नीशियम , आयरन और फाइबर का एक बेहतरीन  स्रोत इसे माना गया है। पेय पदार्थ  के रूप में  इसकी तासीर ठंडी होती है इसलिए लू से बचाता है।  वजन घटाने ,कोलेस्ट्रॉल घटाने में इसका प्रयोग बढ़ चला है , डाइबिटीज में भी कारगर है।  ऐसे ही गुणों के चलते आजकल ये अमेज़न जैसे प्लेटफॉर्म पर विदेशों तक जा पहुँचा है।वैसे कोई स्टार्ट अप मास्टर  देर सबेर गन्ने के जूस और लस्सी की तरह इसे भी  कोल्ड ड्रिंक वाली मार्किट तक पहुँचा देगा।  फ़िलहाल सतुआ संक्रांति और उसके बाद  प्याज  गुड़ और सिरके के साथ सत्तू  लपेट कर खाने का मजा लेते रहिये । 









Friday, April 8, 2022

Be vegetarian

       अभी हाल ही में बच्चों के पाठ्यक्रम की एक किताब पलट रहा था उसमें भोजन के विविध स्वरुप बताये गए थे और उन सबमें गैर शाकाहारी खाने को प्रमुखता से सचित्र दिखाया गया था।  बच्चे ने सवाल भी कर दिया ये आप हमें क्यों नहीं खिलाते ? बताना पड़ा कि उसके पहले इसको मारना पड़ेगा। बच्चे ने कहा सच में ? पूरी बात सुन कर  बच्चे ने मना कर दिया  ... 

   मैं सोच में पड़ गया कि क्या हमारी किताबों में भी इसी तरह पढ़ाया गया था तो याद आया नहीं। बहुत सलीके से समझा दिया गया था और हम समझ भी गए थे।


      ये उन दिनों की बात थी जब हम निकट के सरकारी प्राइमरी स्कूल जाया करते थे। उमर यही कोई ७-८ साल रही होगी।  स्कूल के  कस्बे में एक साप्ताहिक बाजार लगा करती थी जो हम बच्चों के लिए भी उत्सव का केंद्र थी।  एक दिन बाजार के उस कोने से गुजरे जहाँ कुछ विचित्र सा दिख गया।  लकड़ी के तिकोने खूँटों पर उल्टी बकरी लटकी हुई थी जिसका सर गायब था थोड़ी देर समझने में लगा ,लेकिन यह दृश्य इतना भयानक और विचलित करने वाला था कि उस रात भोजन  नहीं खाया  गया।  घर वाले परेशान कि  क्या हो गया इसे ?  बाल मन इस घटना को स्वीकार नहीं कर पा रहा था।  बहुत दिनों के बाद धीरे -धीरे वो दृश्य ओझल तो  हुआ किन्तु आज तक विस्मृत नहीं हुआ जब भी वो रील घूमती है तो मन विचलित हो जाता है.  हाँ एक संकल्प जरूर घूम गया कि कभी नहीं ।  लोगों ने कहा जब बाहर पढ़ने जाओगे तो दिक्कत होगी। खैर ये बात आई गई हो गई।  समय का पहिया घूमा और यूनिवर्सिटी की क्लास में  एक प्रोफेसर साहब जो बायोकेमिस्ट्री पढ़ाते थे आये । प्रोफेसर साहब के बाल काले और घने थे और हर क्लास को वो ये बताना नहीं भूलते थे कि अंडे खाने से उनके बाल  काले और घने हैं अब इस ज्ञान के वशीभूत कई नौजवानों ने मेस में अंडे के लिए लाइन लगाना शुरू कर दिया। बिना अंडे खाये मालवीय भाई साहब के बाल पचास की उमर में भी घने और काले रहे वहीं  बहुत से लोग धन और धरम गँवा कर भी बाल नहीं बचा पाए।  खैर जब तक यह बात समझ  आती तब तक देर हो चुकी थी और प्रोफेसर साहब अपना काम कर चुके थे लेकिन अब पछताए होत क्या ?

      हमारे छात्र जीवन में एक दौर चला जब शाकाहारी होना दकियानूसी और पिछड़ेपन की निशानी समझी जाने लगी।  लोग अपने बच्चों को दादी -दादा और समाज  की नज़र से बचा कर  गैर शाकाहारी बनाने लगे कि कहीं वो पिछड़ा न रह जाय। ब्रेन कम विकसित न रह जाय।   आज जब यूरोप और अमेरिकन देशों  में शाकाहार आंदोलन चरम पर है तो लोग वेगन ढूंढ रहे हैं और इस बीच हम नकल के चक्कर में बेगाने हो गए हैं। 

खैर फिर उसी बिंदु पर लौट के आता हूँ जो किताब में सचित्र छपा था।  आपको याद दिला दूँ कि जिस तरह हिंदी कविता ' छै साल की छोकरी'  का विद्वानों ने विरोध किया उस तरह की एक भी आवाज इस तरह के गैर शाकाहारी ज्ञान गंगा पर किसी ने नहीं उठाई क्योंकि  ठप्पा लगने का डर था  यानि दकियानूसी का , पिछड़ेपन का और अवैज्ञानिक होने का।

       वैसे यह बात सच है कि भोजन नितांत स्वेच्छा का विषय है  होना भी चाहिए।  हर संस्कृति ने अपने विकास के अनुसार इसे अपनाया लेकिन प्रकृति ने मानव को जिस चेतना के स्तर पर देखने की क्षमता दी वो अद्भुद थी  पेड़ पौधे ,पशु पक्षी सब उसके स्वागत के लिए खड़े थे कि  उनका कोई अभिभावक धरती पर आने वाला है लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बहुत पहले अख़बार में एक कार्टून देखा था जिसमें आदमी पिंजरे में कैद थे और जंगल के जानवर उन्हें बाहर से देख रहे थे , सोचिये अगर ये वास्तव में होता ? आपकी समानता की  सीख  किताबों में रखी रह जाती। 

      आज की नई पीढ़ी फिर से सजग और सचेत हो रही है मानवाधिकारों के बाद एक लड़ाई पशु अधिकारों की भी लड़ रही है.  समानता और पशु प्रेम की अलख मानव चेतना के उच्च स्तर का संकेत है जब तक हम आप इस तरह के चैप्टर और पाठ्यक्रम पर लिखने और बोलने की हिम्मत करेंगे तब तक पश्चिम से यह क्रांति आ चुकी होगी जो भारत से निकलनी चाहिए थी। 

 

Saturday, March 12, 2022

S for Science: Part -2

 'S For Science'

Part 2

विज्ञान की दुनिया में जो होता है उसे समझा जाता है कि ऐसा क्यों होता है 

अब ये प्रश्न मन में आता होगा कि दीवार पर सीलन क्यों आ जाती है ? पानी क्यारी में एक जगह डालो और नमी दूर तक दिखती है ?

यह सब कोई चमत्कार नहीं विज्ञान की भाषा में इसे कैपिलरी एक्शन कहते हैं।  सरल भाषा में बात करें तो कैपिलरी एक बहुत पतली नली होती है जिसकी खूबी यह है कि इसका एक्शन सामान्य पाइप या नली से भिन्न होता है।  हम सबको यह पता है कि झील , तालाब की गहराई कितनी भी हो उसकी सतह एकसार होती है लेकिन जब हम उसमे पतली नली डुबा दें तो नली में जल सतह से ऊपर उठ जाता है. इसको इस तरह समझिये कि कोल्ड ड्रिंक के गिलास में जब स्ट्रॉ डाल दिया जाता है कुछ ऊंचाई तक पानी अपने आप चढ़ जाता है। 

तराई के उत्स्रुतब नलकूप इसी सिद्धांत पर कार्य करते हैं।  पेड़ अपनी जड़ों से पानी इसी क्रिया से ग्रहण करते हैं। 

आसान उदाहरण घर में आरती की बाती है रुई के बीच बनी पतली कैपिलरी से तेल अपने आप ऊपर चढ़ता रहता है और दीपक जलता रहता है। घरों में सीमेंट में आने वाली सीलन उसके बीच बनी बहुत महीन नली  चढ़ा हुआ पानी है ये नली इतनी महीन या पतली होती है कि हमें दिखती भी नहीं।  

और हाँ नहाने के बाद तौलिया जो पानी को सोख लेता है उसका राज भी यही है। 

और फिजिक्स की भाषा में हम इसे कैपिलरी एक्शन कहते हैं। 


आपको ये सीरीज कैसी लगी अपना फीडबैक देते रहिये और पढ़ते रहिये ... 

'एस फॉर साइंस '

Monday, February 28, 2022

'S for Science'

  बहुत दिनों से मन था कि हमारी जिंदगी में रोज ब रोज के विज्ञान को सरल भाषा में लिखा जाय जिसमें पारम्परिक ज्ञान को भी समाहित किया जाय ।  आज २८ फरवरी को  विज्ञान दिवस पर  इस सीरीज की शुरुआत करने का विचार मन में आया।  वैसे तो बिना विज्ञान हमारी दिनचर्या अधूरी रहती है लेकिन शायद ही हमारा ध्यान इस पर कभी जाता है 

जैसे कि नींद एक निश्चित समय पर टूट जाती है विज्ञान की भाषा में हम इसे बायो क्लॉक कहते हैं 

जैसे कि हमें भूख और प्यास लगती है आसान शब्दों में शरीर का यह मेटाबोलिज्म है 

जैसे कि मिर्च तीखी लगती है क्योंकि उसमें कैप्सिसिन रसायन होता है 

जैसे कि ऊनी कपड़े में रगड़ होने पर बिजली सी चमक जाती है क्योंकि इलेक्ट्रिक सर्किट बन जाता है 

इस तरह के ढेर सारे सवाल जाने अनजाने मन में उठते होंगे कुछ का जवाब मिल जाता है कुछ का नहीं मिल पाता है 

वैसे विज्ञान अपने में रोचक है ये और भी रोचक हो जाता है जब इसकी जड़ पकड़ में आ जाय।  रोजमर्रा की जिंदगी के कुछ वैज्ञानिक पहलुओं की चर्चा इस सीरीज में करते रहेंगे।  आपकी भागीदारी और टिप्पणी इसे और सरल बनाएगी ऐसा विश्वास है 

एसिडिटी होने पर माँ नींबू पानी पीने को क्यों देती है ?

एसिडिटी पेट में अम्ल यानी एसिड बढ़ने का संकेत है अब जब एसिडिटी बढ़ी तो माँ ऐसी चीज पीने को क्यों कह रही जिसमे एसिड है क्योंकि नींबू भी अम्लीय है ।  लेकिन माँ का विज्ञान अनुभव आधारित है और फायदा भी कर जाता है आइये इसे विज्ञान के नज़रिये से समझते हैं 

    रसायन विज्ञान में बफर सोल्युशन का नाम तो सुना ही होगा बफर सोल्युशन कमजोर अम्ल या कमजोर क्षार वाला द्रव्य होता है जो pH में बदलाव को रोकने का काम करता है , कहने का मतलब ज्यादा अम्लीय या क्षारीय को अपने बराबर लाने या न्यूट्रल करने की कोशिश कर उसे कमजोर कर देता है 

अब नींबू में जो एसिड है वह कमजोर एसिड है और पेट में जो एसिड बना है वो स्ट्रांग एसिड है नींबू पानी बफर सोल्युशन का काम कर के पेट के एसिड के pH  को न्यूट्रल की तरफ ले जाता है इसलिए मम्मी का फार्मूला कामयाब हो जाता है 

इसी तरह जब मधुमक्खी काट लेती है तो उस पर नींबू या नमक का पानी मां रगड़ देती है और आराम मिल जाता है होता यूं है कि मधुमक्खी के डंक मारते समय फॉर्मिक एसिड शरीर में चला जाता है जिससे असहनीय दर्द होता है।  जब नींबू या चूना लगा दिया जाता है तो फॉर्मिक एसिड कमजोर पड़ जाता है और आराम मिलने लगता है। 

तो है न रोजमर्रा  का विज्ञान इतना आसान। 

शेष अगले अंक में 

पढ़ते रहिये 'एस फॉर साइंस '

- डॉ ललित नारायण मिश्र 


Wednesday, February 16, 2022

Saturday, June 19, 2021

किसुली

 किसुली-


     गौहन्ना और अवध में आम के बीज को किसुली कहते हैं । किसुली नाम इसलिए अब तक याद है कि जब आम छोटा और कच्चा होता था तो उसकी किसुली बहुत छोटी सफेद और बिना जाली की होती थी कच्चे आम को फोड़ते ही वह हाथ में आ जाती थी । ये किसुली पकड़ते ही फिसलती थी इसलिए इसके साथ एक मजेदार वाकया जुड़ा हुआ था । किसकी शादी किस दिशा में होगी ये किसुली के उछलने की दिशा पर निर्भर था  किसुली को अंगूठे और तर्जनी के बीच में रखकर उछाला जाता था या यूं कहें कि दबाया जाता था और  किसुली जिधर की तरह उछलती थी मान लिया जाता था कि उस तरफ उस बच्चे की शादी होगी । अब यह उछालने का क्रम हम बच्चों के लिए मनोरंजन  और खुशी दोनों का साधन था।


   अवध क्षेत्र में फलों का मतलब ज्यादातर आम से ही था वहां आम के न जाने कितने बाग होते थे। बागों के नाम भी अलग-अलग तरह के होते थे जैसे भवानी बगिया, दसवन तारा , बझरैया,  गौरैया बाबा,  कारे देव बाबा , घेरवा जैसे न जाने कितने तरह के नाम बाग- बगीचों के होते थे। इन बगीचों में  तरह-तरह के आम होते थे कोई भी दो पेड़ के आम एक टेस्ट के नहीं होते थे कुल मिलाकर हर बार हर बाग आम की जैव विविधता का भंडार था । अचार बनाने वाला आम मोटा होता था। रसीले आम केवल खाने के काम आते थे । खटाई का आम अलग होता था । जब आम की पूरी बहार आती थी तो उसका अमावट पड़ता था । अमावट के लिए आम का रस और गूदा निकाल कर किसी कपड़े के ऊपर धूप में सुखाया जाता था सूखने के बाद रोटी की तरह उसे लपेट दिया जाता था । इसे साल भर कभी भी खा सकते थे ।


     सिंधुरिया आम सिंदूर के रंग का होता था ।  मॉल दहवा आम मोटा होता था , खट्टहवा आम बहुत खट्टा होता था कहते थे कि अगर इसे मुर्दे को खिला दो तो वो भी उठ कर भाग जाएगा । इसी तरह बहेरी आम सबसे छोटा होता था और  एक ही बार में उसे पूरा मुंह में भर सकते थे  । तोतहवा आम की चोंच निकली होती थी। इनका वैज्ञानिक नाम भले न था पर इस तरह आम के न जाने कितने प्रकार और उनकी किस्में गांव में मौजूद थी। बताते हैं कि एक लाख देशी वेराइटी के आम के बाग भी राजाओं के पास थे जिसे लक्खी बाग कहते थे ।  एक खास बात हर आम के साथ थी कि उसकी चोपी निकालनी पड़ती थी।  यह चोपी डंठल के पास जमा हुआ एसिड होता था अगर यह मुंह में चला जाता था तो खांसते खांसते बुरा हाल होता था।हर बाग हर साल फलता था चाहे दो चार पेड़ों पर ही बौर आएं आते जरूर थे । बौर आने के समय आम के नीचे से अगर गुजर गए तो भुनगे यानि छोटे -छोटे कीड़े बहुत बुरा हाल करते थे । 


     आम बीनने के चक्कर में हम बच्चों के बीच अक्सर अधिकार को लेकर कहा सुनी और मार पीट हो जाती थी । कभी कभी बच्चों की यह लड़ाई खतरनाक रूप से बड़ों की लड़ाई बन जाती थी और एकाध बार लाठियां चलने की नौबत आ जाती थी । आम के सीजन के बाद फिर से पुराना मेल -भाव बहाल हो जाता था। हालांकि आम ही ऐसा फल था जो सबको मिल पाता था इसलिए उर्दू में सर्व सुलभ को आम कहा जाने लगा जैसे कि आम जनता, आम रास्ता । बताते चलें कि आम्र संस्कृत भाषा का शब्द है जिसे उर्दू ने शायद स्वीकार कर लिया होगा ।


   आम के ही सीजन में जामुन का भी फल आता था कहते थे कि भगवान ने एक तरह मीठा आम दिया तो दूसरी तरफ उसकी मिठास से शुगर न  बढ़ जाए इसलिए जामुन पैदा किया । अगर ज्यादा आम खा लिया तो दो चार जामुन खाना जरूरी होता था जिससे कि आम पच जाए। आम के ही सीजन में आम पकने के दौरान बारिश भी होने लगती थी जिससे बाग बगीचों मैं पानी  भर जाता था अक्सर आम बीनने के लिए घुटने घुटने पर पानी में मेहनत करनी पड़ती थी। इस दौरान सांप और बिच्छू जैसे खतरनाक जानवरों से भी सामना करना पड़ता था। अगर झापस लग गया तो समझो आम भदरा गया यानि आम को अब बीनना भी श्रम साध्य हो जाता था, उस समय इतना आम गिरता था कि बाग को बुहारना पड़ता था ।


 अस्सी के दशक बीतते -बीतते कलमी आम का दौर अवध क्षेत्र में शुरू हो गया था । देसी पेड़ धीरे धीरे खत्म होने लगे  । बाग बगीचों में लोगों ने कलमी पेड़ लगाने शुरू कर दिए  । कलमी आम के अच्छे दाम मिलते थे और किसानों को जमकर आमदनी होने लगी। रसायनिक  कीटनाशकों और फ़र्टिलाइज़र का खूब उपयोग होने लगा । देसी पेड़ों को तो कोई खाद पानी भी नहीं पूछता था । धीरे धीरे अवध क्षेत्र से देसी पेड़ लगभग लगभग लुप्त प्राय हो गए और नेचुरल जीन बैंक धीरे धीरे स्वयं ही समाप्त होने लगा । देसी पेड़ लंबे समय तक फल देते थे कुछ पहले शुरु हो जाते थे और कुछ बहुत बाद तक फल देते थे । आखिर तक फल देने वाला पेड़ हमारे बाग में सवनहा के नाम से जाना जाता था । गिलहरी और चिड़ियों के कटे आम खासकर तोते के अधखाए कच्चे आम से पकते हुए सावन तक के आम अब गौहन्ना में छोटे कद के कलमी आम की भेंट चढ़ चुके हैं । दो- चार देशी आम के बाग अब भी वहां  किसी बुजुर्ग की तरह गांव की बदलती आबो हवा को देख रहे हैं और अपने दिन गिन रहे हैं । देशी आमों का वैविध्य पूर्ण साम्राज्य पूंजीवादी कलमी आमों की भेंट चढ़ चुका है ।देशी आमों के दौर में पहले कोई किसी को आम खाने से मना नहीं करता था बाग चाहे जिसका हो, लेकिन अब तो कलमी आमों के बाग में मजाल है कि दूसरा कोई घुस जाय ।


    जब आम के बीज यानि किसुली इठला  कर पेड़ बनने लगती थी तो हम बच्चे उसकी सीपी बनाते थे जो कई तरह की  ध्वनि निकालती थी । अमोला यानि आम का पौधा जैसे ही बड़ा हो जाता था वो फिर किसी बाग का हिस्सा बना दिया जाता था। देशी आम और अमोलों की पीढ़ी रोजगार की तलाश में शहर को जा चुकी है ।  सुना है कुछ प्रकृति प्रेमी फिर से देशी आम के बीज इकठ्ठा कर लगवा रहे हैं । क्या पता आम की ये देशी किसुली किस दिशा में गिरेगी और लहलहा कर लंबे पेड़ के रूप में खड़ी हो जायेगी और रिसर्च पेपर छपेंगे " गांव में फिर मिला आम का जीन बैंक" । वैसे हम तो किसुली को ही श्रेय देंगे जो शादी कराती थी।


(गौहन्ना डॉट काम पुस्तक का अंश )