Friday, December 16, 2011

मै खुश हूँ -

मै खुश हूँ क़ि कचरे से दूर हूँ
क्योंकि मैं गाँव में हूँ अपनों की छाँव में हूँ ।
मै खुश हूँ क़ि मुझे सुबह-शाम कुत्ते नहीं टहलाने पड़ते
लूट हत्या वाली ख़बरें मेरे घर नहीं आतीं क्योंकि मेरे घर चैनल और अखबार नहीं आते ।
मै खुश हूँ क़ि मुझे शेयर बाज़ार का कीड़ा नहीं काटता
ट्रान्सफर पोस्टिंग का लफड़ा अपने जेहन में नहीं आता
घोटाले और घूस की अंकगणित मुझे नहीं आती
मैं विद्वान् भी नहीं जिस पर मैं घमंड करूँ सर पर लाद कर घूमता फिरूँ ...
फिर भी मै खुश हूँ क़ि उतना मैं भी खाता हूँ जितना वो नेता और प्रोफेसर
वो खाकर बीमार पड़ जाता है और मैं खाकर जी जाता हूँ
वो डर-डर खुदा खरीदने की कोशिश करता है
मैं दर-दर खुदा पा जाता हूँ
वो अपनी दुनिया में ही हार जाता है मैं खुद को हार कर सब जीत जाता हूँ
और इस तरह मैं खुश से खुश-नशीब होता जाता हूँ .-ललित

Friday, November 25, 2011

इक जानवर की जान आज इंसानों ने ली है --चुप क्यों है इंसान ?

आदमी का वहशीपन रह-रह कर जागता है और हम फिर यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं की हम सभ्य हुए भी कि नहीं ? उत्तराखंड के पौड़ी जिले में बून्खाल कालिका देवी मंदिर पर आज भैंसे और बकरों की बलि चढाने के लिए मनौती कर्ता उन्मादित हैं । जिस जानवर की बलि चढ़ाई जाती है उसे पहले खूब शराब पिलाई जाती है फिर उसे डंडे मारमार कर पूरे खेत में दौड़ाया जाता है इतना दौड़ाया जाता है कि उसकी जीभ लटक कर बाहर निकल आती है । जब थक जाता है तो फिर डंडे पड़ते हैं फिर से दौड़ता है और फिर कुछ तथाकथित धर्म के ठेकेदार उसकी गर्दन तलवार से काट देते हैं । इस तरह सैकड़ों बेजुबान जानवरों को तडपा-तडपा कर मार दिया जाता है और मान लिया जाता है कि देवी खुश हो गयी । पता नहीं देवी अपने बेजुबान बच्चों की हत्या पर कितना खुश होती होगी लेकिन इतना जरूर है कि हम कितना भी मोडर्न हो जाएँ वहशीपन का कीड़ा हमें रह-रह कर न जाने कब तक काटता रहेगा।-Lalit

Thursday, November 24, 2011

फिर से-

सुना है कुछ बँट रहा है अरे यह तो यू.पी.है । घर-आंगन का बंटवारा , जमीन जायदाद का बंटवारा .......दिलों का बंटवारा ......कुछ दिनों बाद हर जिले में एक सी.ऍम और एक सचिवालय की मांग हम भी करेंगें।

Monday, November 21, 2011

अजीज आज़ाद की रचना-

अब मेरा दिल कोई मज़हब न मसीहा माँगेये तो बस प्यार से जीने का सलीका माँगे...ऐसी फ़सलों को उगाने की ज़रूरत क्या हैजो पनपने के लिए ख़ून का दरिया मांगेसिर्फ ख़ुशियों में ही शामिल है ज़माना साराकौन है वो जो मेरे दर्द का हिस्सा मांगेजुल्म है, ज़हर है, नफ़रत है, जुनूँ है हर सूज़िन्दगी मुझसे कोई प्यार का रिश्ता मांगेये तआलुक है कि सौदा है या क्या है आख़रलोग हर जश्न पे मेहमान से पैसा मांगेकितना लाज़म है मुहब्बत में सलीका ऐ‘अज़ीज़’ये ग़ज़ल जैसा कोई नर्म-सा लहज़ा माँगे- अज़ीज़ आज़ाद

Saturday, November 12, 2011

मीडिया का सच-

पत्रकारिता उर्फ़ जर्नलिज्म बहुत से लोगों की चाहत है ,तमन्ना है. कुछ शौकिया करते हैं तो कुछ पत्रकारिता के लबादे में बड़े-बड़े खेल करते हैं । चाहे न्यूज़ पेपर/ चैनल के शिखर पर बैठे मालिक हों या हाकर से पत्रकार बन बैठे लेफ्ट -राईट पत्रकार । इस पत्रकारिता की दुनिया में कुछ ऐसे हैं जो लाखों का पॅकेज लेकर काम करते हैं हर महीने ५० हज़ार या ज्यादा वेतन पाते हैं तो वहीं कुछ या यूँ कहें तमाम सर्वहारा वर्ग वाले पत्रकार हैं जो दिन भर खबर जुटाने के बावजूद रोटी का जुगाड़ भी नहीं कर पाते । फिर कुछ मुड़ते हैं दर-दर विज्ञापन ढूँढने के लिए तो कुछ ख़बरों के खुलासे का भय दिखाकर नेताओं, अधिकारियों को ब्लैक मेल करने के इरादे से धमकाने की राह पर । इस सर्वहारा वर्ग के पत्रकारों पर न तो उस अखबार का आई कार्ड होता है जिसके लिए वे काम करते हैं और न ही उनकी लाइफ का बीमा । उनकी भेजी ख़बरें छपती तो जरूर हैं पर उनकी अपनी पहचान .......?? पता नहीं । जिसको अपनी ख़बरें छपवानी होती है वो उन्हें कुछ नजराना देता है और अगले दिन अखबार या टी वी पर उसकी खबर लग जाती है मीडिया की चकाचौंध में अँधेरे की एक लम्बी फेहरिस्त है । कभी किसी सर्वहारा पत्रकार से मिलकर देखिये इस सबके बावजूद उसकी ऐंठ बरक़रार मिलेगी बातें ऐसी क़ि जर्नलिज्म में पीएचडी कर रखी है. सबकी लड़ाई लड़ने वाले इन पत्रकारों के हक में खड़ा होने वाला कोई नहीं । दूसरों को हक दिलाने वाला खुद हक मांगे तो किससे और फिर देगा कौन ?

Friday, November 11, 2011

बाकी सब ठीक है

कहने के लिए भारतीय लोकतंत्र में कोई भी चुनाव लड़ सकता है जो भारत का नागरिक है और पागल या दिवालिया नहीं है और निर्धारित उम्र पूरी कर चुका होहोरी ने चुनाव लड़ने की सोची है उसको नहीं पता की परधानी में खर्चा लाख,विधायकी में ३० लाख और सांसदी में ९० लाख आता हैपढ़े लिखे मतदाता जो भारत की तस्वीर बदलना चाहते हैं धूप में वोट देने नहीं जा सकते और जो वोट देने के लिए दिहाड़ी छोड़ कर जाते हैं वे वोट का सौदा करना ज्यादा पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें पता है क़ि ये मौका साल में सिर्फ एक बार ही मिल सकता हैदेश में लगभग . करोड़ मतदाता जो सरकारी कर्मचारी हैं अपने वोट का इस्तेमाल नहीं कर पाते विशेषकर लोकसभा और विधानसभा चुनाव में ड्यूटी के टेंशन में वोट देने का कर्त्तव्य निभाना मुश्किल हो जाता हैये . करोड़ ऐसे हैं जो चुनाव लड़ भी नहीं सकतेबाकी सब ठीक है

Wednesday, October 5, 2011

नेम सिंह रमन उर्फ़ रमन दा -


नेम सिंह रमन उर्फ़ रमन दा -
समय से आगे चलने वालों को कभी-कभी पागल समझ लिया जाता है । दुनियादारी के अनुकूल न होने की कभी-कभी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है । मनोवैज्ञानिक रामायण के रचयिता रमन दा (5/1/1932) के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ जब उनके क्रांतिकारी विचारों और कार्यों से परेशान उनके कांस्टेबल पिताजी ने उन्हें ताजमहल दिखाने के बहाने आगरा के पागलखाने में भरती करा दिया

जहाँ उन्होंने कागज कलम के अभाव में अपने कुरते की सफ़ेद बटन तोड़ कर फर्श पर ये कविता लिखी -

पागल समझा देश दिवाना,
दुग्ध पत्र लखि कलार के ढिंग मदिरा सब ने जाना
लोभी लोग मिली नहि माया छोड़ दिया अपनाना
साले ससुर पिता सब बोले भेजो पागलखाना
मां ने कहा मृत्यु दे भगवन लुट गया लाल खजाना
बेच रहा गुंजों में मुक्ता भील नहीं पहचाना
झूठा कह कर देश दीवाना पागल सबने माना
रमन हुआ तब झूठे जग में झूठा पागलखाना

पागलखाने के डाक्टरों ने जब यह सुना तो अवाक् रह गए रमन जी से पूछा की तुम पागल तो नहीं लगते आखिर बात क्या है रमन दा ने जवाब दिया की डाक्टर साहब दुनिया से एक इंच ऊपर उठ जाओ या एक इंच नीचे हो जाओ तो पागल ही कहे जाओगे ,दुनिया के साथ न चलना पागलपन है उस दिन के बाद रमन दा को पुअर क्लास से बदलकर सेकंड क्लास खाना मिलने लगा ।
दुनिया के साथ न चलने की जिद नौकरी में भी रमन दा के साथ रही इमानदारी कोई इनसे सीखे । एक महिला नक़ल की फीस के २ रुपये की बजाय 5 देकर चली गयी छः महीने तक उसे ढूंढते रहे और बाकी के तीन रुपये लौटा के ही चैन लिया ।
लेखपाल की नौकरी में गणित की ढेरों गुथ्थियाँ सुलझाईं, नए सूत्र बनाये जो अभी तक अप्रकाशित हैं । रमन दा की कालजयी कृति "मनोवैज्ञानिक रामायण" है .जिन्दगी के 79 बसंत देख चुके रमन दा आज भी साहित्य जगत में सक्रिय हैं उन्हें लोग इन्द्रधनुषी कवि के नाम से जानते हैं क्योंकि व्यंग्य से लेकर गंभीर आध्यात्म तक उन्होंने बहुत कुछ लिखा है ।
कुछ झलक-

दर्शन :-जिसकी फसल उगाना चाहो बीज वही बोना पड़ता है
अपना जिसे बनाना चाहो उसका खुद होना पड़ता है .

सबसे पहले अपने घर में देखिये बाद में पूरे शहर में देखिये
मां के बेटे साथ रहते हों जहाँ आप जा के दुनिया भर में देखिये ।
हास्य :-
सबसे अच्छा माँ का दूध
मीठा नहीं मिलाना पड़ता
गरम नहीं करवाना पड़ता
बिकने वाला माल नहीं
बिल्ली पिए मजाल नहीं ।

एक डाक्टर साहब थे फ़ौज में छुट्टी बिताई मौज में
जब घर से वापस जाने लगे पत्नी से यूँ फरमाने लगे
हम तुम रोजाना पत्र डालते रहें इस तरह परस्पर प्रेम पालते रहें
एक दिन पत्नी का पत्र नहीं आया डाक्टर बहुत घबराया
पड़ोसियों ने बताया आपकी गृहस्थी की बर्बादी हो गयी
डाक्टरनी और डाकिया की शादी हो गयी ।

रमन दा का लिखा बारहमासा उस दौर में ग्रामोफोन में बजता था जिसे ट्रेन में गा कर बहुत से खानाबदोश व गरीब अपनी जीविका चलाते थे । ये रेकॉर्डिंग हिंदुस्तान रेकर्स बनारस ने बनाई थी । रमन दा (इटावा ) का मोबाइल नंबर है 09219031545