Tuesday, September 1, 2020

बेजुबानों के मसीहा -

बेजुबानों के मसीहा - कहते हैं कि देवत्व एक गुण है उतर आए तो दुनिया स्वर्ग बन जाए । ऐसा ही कुछ किया है हरिद्वार के युवाओं ने वैसे तो ये पढ़ाई भी करते हैं , अपना बिजनेस भी करते हैं लेकिन जानवरों के प्रति इनका लगाव अनूठा है । फीड स्ट्रे एनिमल संस्था से जुड़े ये युवा रोज जानवरों को खाना खिलाते हैं लेकिन जो अभिनव प्रयोग ये कर रहे हैं उसकी तारीफ जरूर होनी चाहिए । इनकी टीम को ये लगा कि रात्रि में जानवर दिखाई न देने से गाड़ी वाले अक्सर इन्हे टक्कर मार देते थे जिससे ये बेजुबान या तो अपना जीवन खो देते थे या हमेशा के लिए अपंग हो जाते थे फिर इनकी देखभाल करने वाला भी कोई नहीं । नवदीप अरोड़ा और रुचि की टीम ने इस पीड़ा को महसूस ही नहीं किया बल्कि 40-50 युवाओं की टीम के साथ रिफ्लेक्टर वाला कालर इन जानवरों को पहनाना शुरू किया । ये काम इतना आसान नहीं था बहुत से जानवर रिएक्ट भी करते थे लेकिन इन युवाओं ने बहुत से जानवरों जैसे गाय और कुत्तों को रिफ्लेक्टर युक्त कॉलर पहनाए जिससे बहुत सी दुर्घटनाएं अपने आप थम गईं । शुरू- शुरू में इस टीम को रिफ्लेक्टर ऑटो गैराज की दुकान से मांग कर लेना पड़ा, जब इनका अभियान सफल हुआ तो बड़े स्केल पर मंगाना पड़ रहा है। टीम के इस अभियान को जनता और अधिकारियों का भी समर्थन मिलने लगा । फिलहाल टीम आवारा पशुओं और सायकिल मजदूर पर फोकस कर रही है जहां ये कॉलर और स्टिकर अभियान चला रहे हैं । टीम रोज अपने अभियान को नए आयाम देने में लगी है । ऐसी अनोखी पहल हर जगह हो जाय तो दुर्घटनाएं अपने आप कम हो जाय । ये युवा भारत है जो किसी के भरोसे नहीं अपने दम पर बदलाव की उड़ान भर रहा है ।>










 

Wednesday, August 26, 2020

इंस्टैंट राशन-

 

(लघु कथा)

 

  मेरे मित्र आशू जो हरिद्वार में रहते हैं पिछले दिनों लॉक डाउन के दौरान की एक घटना शेयर कर रहे थे ।  गांव और किसानी से जुड़ी ये घटना हमारी लाइफ स्टाइल को देखते हुए और भी महत्वूर्ण बन जाती है उन्होंने बताया कि अम्मा और उनका संयुक्त परिवार जिसमें छोटा भाई बहू सब साथ साथ रहते हैं लेकिन अम्मा अक्सर कहती रहती हैं कि बेटा घर में एक साथ दो चार कुंतल अनाज पड़ा रहना चाहिए । 

     

      इस बात पर छोटे बेटे को बहुत ऐतराज होता था  "क्या अम्मा ? तुम भी न ! गांव थोड़े ही है ये , शहर है शहर । बगल का आढ़्तिया मेरा दोस्त जिस तरह का अनाज चाहिए वो सब तो दे देता है ये गया और वो लाया । ढेर सारा अनाज लाकर घर पर रखो फिर उसमे कीड़े लग जाते है फिर उसे साफ करो । क्या फायदा , अब आपकी उमर आराम करने की है आराम से भजन करो और बहुओ के हाथ का खाना खाओ । इंस्टैंट राशन है न बाज़ार में वो भी साफ सुथरा और स्वादिष्ट ।"


  अम्मा को लगा कि ये मेरी बात नहीं सुनेगा तो आशू यानि बड़े बेटे से उन्होंने अनाज लाने की इच्छा जाहिर कर दी । आशू अम्मा की बात रखते हुए कुछ अनाज घर लेे आए और रखवा दिया । 


    जिन लोगों ने गांव का जीवन देखा या जिया होगा वो  समझते होंगे कि किसान किस तरह फसल काटने के बाद उसे बड़ी मेहनत से साल भर सहेज कर रखता है । उसी से साल भर खाने का इंतजाम करता है और अगली फसल के लिए बीज भी निकालता है । अम्मा भी उसी जमाने की थीं फिलहाल बच्चों के साथ रहने को शहर आ गईं थीं । 


  अम्मा अब रोज अनाज साफ कर के लोहे की टंकी में भर रही थीं उनके चेहरे पर एक संतोष था लेकिन छोटे बेटे को ये सब बेकार की मेहनत लग रही थीं । उधर अम्मा को अपनी मेहनत पर सुकून था । उन्होंने अपने दौर में ये सब कुछ देख रखा था और कर भी रखा था ।


   "बेटा परेशान मत होना लॉक डाउन तीन हफ्ते का ही लगा है न" ? अम्मा बोलीं । "चाहे छः महीने का भी लग जाय हमने व्यवस्था कर रखी है घर पर राशन की कमी नहीं है । कहीं नहीं निकलना पूरे परिवार को । घर पे सब कुछ है ।  छुटके को भी कह देना कहीं न जाय । बिल्कुल परेशान न हो वो । "  

    

  आशू अम्मा की बात सुनकर मन ही मन मुस्करा रहे थे छोटे बेटे के दोस्त की दुकान लॉक डाउन में बन्द हो चुकी थी घर से बाहर की गली में पुलिस का पहरा था । अम्मा की चादर पर फैले अनाज से एक चिड़िया अपने बच्चों के लिए दाना लेने भी आ गई थी । 😊

Tuesday, July 14, 2020

पोथी पढ़ पढ़ -

  बात उन दिनो की है जब पूसा इंस्टीट्यूट नई दिल्ली में पढ़ाई और रिसर्च दोनों चल रहा था । पढ़ाई अपने अंतिम चरण में थी और करियर की चिंता सर पर सवार थी । एक्जाम पर एक्जाम होते जा रहे थे , कभी पहला चरण पार होता था कभी दूसरा इसी तरह हम उम्र साथियों की दिन चर्या एक दूसरे को दिलासा देते गुजर रही थी । हमारे एक मित्र थे प्रभात शुक्ल Prabhat Kumar  जो आजकल उसी संस्थान में प्रधान वैज्ञानिक हैं वो हर रिज़ल्ट के बाद एक जुमला दोहरा दिया करते थे "Success has a thousand fathers, but failure is an orphan." उनका ये जुमला किसी ठंडे मरहम की तरह दिल को सुकून दे दिया करता था कि चलो फिर से लगो दोस्तों अभी अपना समय नहीं आया है उस समय उनका वो जुमला उतना समझ में नहीं आया जितना आज इस *सेंचुरियन जेनरेशन* को देख कर समझ आ रहा है ।  दसवीं और बारहवीं के नतीजे धड़ाधड़ आ रहे हैं । कुछेक शत प्रतिशत नंबर लेकर पास हो रहे हैं। सोशल मीडिया में बधाइयों का दौर मै भी देख रहा था तभी ऑफिस के एक हंसमुख कर्मचारी ने बड़े उदास होकर कहा " सर बिटिया कल से खाना नहीं खा रही उसके  परसेंट कम आएं हैं " मैंने  पूछा कितने आए हैं तो उसने बताया कि यही कोई 65% । मैंने कहा कि नंबर तो बहुत अच्छे हैं उसने कहा कि स्कूल में कई बच्चों के 90% के ऊपर हैं । बात यहीं से गड़बड़ा गई वो बच्ची जो अपनी मेहनत से 65% से ऊपर नंबर ला चुकी है उसका आत्मविश्वास सिर्फ इसलिए डगमगा रहा था कि उसे कईयों  से कम नंबर मिले , यही नहीं लोगों की तारीफ नहीं मिली, स्कूल की भी तारीफ नहीं मिली क्योंकि नगाड़े सेंचुरियन के लिए बज रहे थे । उस जुमले में असफल अनाथ होते थे इस दौर में सफल बच्चे भी अनाथ से हो रहे हैं । ये समय है जब बच्चा समाज और स्कूल से आंखों ही आंखों से बहुत कुछ सुनना चाहता है मां बाप और परिवार से बहुत से दर्द बांटना चाहता है इस दर्द को न बांटने का परिणाम भयावह होगा। ये वो पीढ़ी है जिसको मनचाही सफलता से नीचे कुछ भी मंजूर नहीं उसे ये पाठ कभी पढ़ाया ही नहीं गया कि हार के बाद जीत भी होती है समय हमेशा एक जैसा नहीं होता । न ये चैप्टर स्कूल की किसी किताब में उसे मिला न ही घर की किसी दीवार पर । अब उसे अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है और यहीं से डिप्रेशन की शुरुआत हो जाती है जो मां बाप और पड़ोसी फर्स्ट आने पर ताली बजाते और केक काटते थे वे अवाक से गुमसुम हो जाते हैं । उस बच्चे ने अब तक तालियां बजते देखी थीं नंबर कम आने या फेल होने पर कैसे संभला जाता है ये किसी ने सिखाया नहीं था उसे क्या पता कि जिस कबीर पर लोग पीएचडी करते हैं वो अनपढ़ थे , कालिदास की जीवन यात्रा विफलताओं से ही शुरू हुई । न जाने कितने आविष्कार सैकड़ों प्रयोग फेल होने के बाद सफल हुए। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के नाम असफलताओं की लंबी फेहरिस्त है ।  कभी आपने ये जानना चाहा क्या कि भगवान बुद्ध को कितने नंबर मिले? क्योंकि जिंदगी नंबर से नहीं कर्मों से पहचानी जाती है ।  ये जीवन अमूल्य है स्कूल और किताबें ही जिंदगी का परिणाम घोषित नहीं करतीं । बहुत से टॉपर्स कॉम्पटीशन के दौर में लड़खड़ा जाते हैं , स्कूलों के नम्बर दीवार पर धूल खा रहे होते हैं और गोल्ड मेडल पर लगी जंग बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है । जिंदगी इन नंबरों और भेड़ चाल के सामाजिक पैमानों पर नहीं चलती ।सिर्फ नंबर ही जिंदगी नहीं है जिंदगी नंबरों की दौड़ से बहुत परे है । यहां वही सम्राट होता है जो गिर कर भी संभलना सीख लेता है। जिंदगी अपनी पाठशाला में ही असली सबक सिखाती है और निष्पक्ष नंबर देती है। ये बात तब और बेहतर समझ में आएगी जब स्कूल और यूनिवर्सिटी का दौर पार कर आप कहीं नए मुकाम पर खड़े होंगे और अपने साथ साथ इस देश के लिए कुछ नए सपने देख रहे होंगे ।आप इस देश का भविष्य हैं आपके अंदर बहुत संभावनाएं हैं उसे तलाशना और तराशना है , आपसे बेहतर तोहफा इस देश के लिए कुछ भी नहीं है, बस हिम्मत मत हारना ।- ललित ( सत्यमेव जयते )

Thursday, June 11, 2020

तुम्हें कुछ भी नहीं आता -

रहा तालीम का ता उम्र हावी सिलसिला हम पर
मगर फिर भी मिले ताने, तुम्हें कुछ भी नहीं आता

शिकायत इस तरह कुछ मेहरबां, होती रहीं अक्सर
लिखावट माशा अल्ला है, मगर पढ़ना नहीं आता

फकत चलने की चाहत में, फिसलती जिंदगी हर पल
गिरे कुछ इस कदर साहब, कि अब उठना नहीं आता

कभी देखा नहीं खुद को, रहे रूठे हमीं से हम
गजब चिल्ला रही दुनिया , मुझे सुनना नहीं आता

नजर छुपते छुपाते, रूह से दीदार कर बैठी
उसे पूजा नही आती,मुझे सजदा नही आता

हुए जब रू बरू दिल से, हक़ीक़त आ गई आगे
डरे सहमे कदम हरदम, तुम्हे जीना नहीं आता

तुम्हारे खत में थी जो इक पहेली, उसमें उलझा हूं
तुम्हें लिखना नहीं आता, हमें पढ़ना नहीं आता


खुलासा ये हुआ आख़ीर में, क्या खाक पढ़ लिक्खे
तुम्हें ये भी नहीं आता, तुम्हें वो भी नहीं आता। - ललित

Saturday, May 23, 2020

कोरोनिए-

लघु कथा

 *कोरोनिए*-

(साभार जेएमडी, सभी
 पात्र व घटना काल्पनिक)

 आज फिर जगई अचंभे में था बब्बन अपनी कार पे चिपकहवा पास लगा कर थोड़ी देर पहले शहर की तरफ जाते दिखा था जबकि घरैतिन के इलाज के लिए पिछले दस दिन से जगई को पास नहीं मिल पा रहा था।  वैसे शहर में लॉक डाउन का चरण ही बदला था बब्बन का चाल चलन वही था जो ताला बन्दी के पहले था । बब्बन को जब से पिछले साल दारू का ठेका मिला था तब से उनमें संस्कारिक परिवर्तन का उबाल देखने को मिल रहा था । माथे पर लंबा लाल तिलक और गले में केसरिया गमछा , मुंह में पान की गिलौरी , झुक कर बिना बोले सब को प्रणाम  । बब्बन अब गली के गुंडे से बब्बन भैया हो गए थे । जब से संस्कारों का उदय हुआ था तब से उनके आगे पीछे गली मोहल्ला संस्करण चिंटू पिंटू के नाम बदल कर चिंटू भैया और पिंटू भैया हो गए थे
  बब्बन भैया लॉक डाउन के पहले सोमरस की होम डिलीवरी में पूरे इलाके को मात कर चुके थे लेकिन लॉक डाउन के चलते सरकार ने दुकान पर मातम ला दिया था 4-4 दुकान के सेल्समैन और 10-15 होम डिलीवरी के लाखैरे सब बब्बन भैया के संस्कारों पर पल रहे थे । दुकान के पीछे चलने वाली चखना रेस्टोरेंट भी लालटेन में घासलेट की आखिरी बूंद को हजम कर भभक भभक कर अन्तिम सांसे गिन रहा था ।
  जगई का कलुआ वैसे तो एक कुत्ता प्रजाति का मरियल सा पिल्ला था लेकिन जब से चखना रेस्टोरेंट जाने लगा था तब से जगई की तरफ टांग उठाने में उसे संकोच नहीं होता था । आज जैसे बब्बन भैया अपनी गाड़ी से निकले तो कलुआ ने कंधे तक शस्त्र उठा कर सलामी दी । इस सलामी ने जगई को ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर बात क्या है ? इस पास की बब्बन भैया को जरूरत क्या पड़ गई ? कलुआ की सलामी से इस बात के संकेत मिल गए थे कि बब्बन भैया किसी बड़ी समाज सेवा को अंजाम दे रहे थे। बब्बन भैया की गाड़ी कुछ दूर जाकर उस चौराहे पर रुक गई जहां वर्दी वाले कोरोना वारियर जमे हुए थे । थे तो वो दूसरे थाने के लेकिन बब्बन भैया लॉक डाउन के पहले दिन से ही सुबह शाम उनका ध्यान रख रहे थे । गाड़ी में ब्रेक लगते ही बब्बन भैया के चिंटू और पिंटू मुंह पर गमछा लपेटे पानी की बोतल और पूड़ी सब्जी का पैकेट लेकर साहब की सेवा में पहुंच गए। गाड़ी में बैठे बैठे ही शीशा खोलकर पान थूक कर  बब्बन भैया चिल्लाए "साहब आज दो ढाई हजार गरीबों को भोजन देना था इसलिए भंडारा तैयार करने में देर हो गई " । 'कौनौ बात नहीं दरोगा जी खेखार कर बोले । इंहा सबेरे से सूखे जा रहे थे तुम आए तो जान में जान आई । बहुते नेक काम कर रहे हो बब्बन  । तुम इस इलाके के लोगों के लिए मसीहा हो मसीहा '।
  बब्बन दोनों हाथ जोड़ कर दरोगा जी के आशीर्वाद से कृत कृत्य हो रहे थे उधर चिंटू और पिंटू ने जब तक दरोगा जी और उनकी टीम को गले तक पूड़ी नहीं खिला दी तब तक आगे नहीं बढ़े । बब्बन अब दोनों चेलों को गाड़ी में ठूंस कर आगे गरीब बस्ती में पहुंच गए वहां पहले से ही खाने वालों की लंबी कतार लग गई थी सोशल डिस्टेंस के मंत्र के साथ चिंटू पिंटू बोनट पर रख कर एक एक कर गरीबों को खाना बांट रहे थे । पीछे से धीरे से बगल  की दुकान का शटर उठा कर मगलू ने चार - पांच  बड़े गत्ते  जिस पर निःशुल्क भोजन सेवा लिखा था बड़ी नजाकत से गाड़ी से खींच कर शटर के अंदर सरका दिए । खाना बांट कर बब्बन भैया ने बड़े प्यार से मगलू को समझा दिया कि जो संभ्रांत लोग शरम के मारे खाना लेने नहीं आ पाए उन्हें अपने सेवादारों से घर तक भिजवा देना । मगलू होम डिलीवरी का पुराना उस्ताद था उसने कनखियों से बब्बन को आंख मारकर सब समझने का संकेत दे दिया तो बब्बन तसल्ली से मुस्कराए ।
  गाड़ी को लौटने में तीन घंटा लगा लेकिन तब तक कलुआ एकटक उस राह को ही तके जा रहा था जैसे ही गाड़ी जगई के चौराहे पर आईं कलुआ ने बाजू शस्त्र किया और साष्टांग हो गया । बब्बन भैया ने धीरे से बचा हुआ चखना कलुआ को सरकाया तो जगई ने लंबी सांस ली और बुद बुदाया हे भगवान कोरोनियो के हाथ कितने लंबे हैं ? ठेका बन्द है लेकिन दुकान घाटे में नहीं है। 

Monday, May 4, 2020

इमेज-

इमेज - 

(साभार: JM दुनिया से)

  इंचार्ज साहब की जय हो पुलिस प्रशाशन जिन्दाबाद के नारे गूंज रहे थे महकमे के लोगों पर हर गली में फूलों की बरसात हो रही थी । सब गदगद थे इंचार्ज साहब से । टूटी चारपाई पर पड़े जगई ने ध्यान से देखा तो वर्दी में इलाके के नए थानेदार साहब नजर आए मुंह पर मास्क लगाए थे उनके आगे पीछे लगभग बीस पुलिस वाले हाथों में खाने का पैकेट लिए चल रहे थे । जो भी गली में गरीब जैसा दिख जा रहा था उसे पकड़ पकड़ कर खाना पकड़ा कर बढ़िया सी फोटो ग्राफी व वीडियो ग्राफी हो रही थी ।जगई पुलिस का यह नया चेहरा देख कर दंग था होली के समय जब वो फैक्ट्री से काम कर के लौट रहा था तो एक कार ने उसे टक्कर मार दी थी जब वो एफ आई आर कराने थाने पहुंचा था तो इन्हीं थानेदार साहब ने दिन भर बैठा के रखा था भूखे प्यासे बैठे बैठे जब न रहा गया तो इनसे कई बार हाथ पैर जोड़े थे कि साहब एप्लिकेशन तो लेे लो लेकिन साहब न पसीजे । जब रात के 10 बज गए तो बोले कि वो नगर सेठ के बेटे की गाड़ी थी उसके खिलाफ मामला दर्ज नहीं कर सकते और नुकसान ही कितना हुआ थोड़ा तुम टूटे हो और  सायकिल की रिम ही तो टूटी है रात 12 बजे गाली देकर धक्के मारकर थाने से भगा दिया था इन्होंने । हां यही थे आज भले ही मास्क लगाए हों लेकिन थे यही साहब ।पोस्टिंग के कुछ ही दिनों में साहब की गाथा पूरे इलाके में गूंजने लगी थी जिस गांव जाते थे वहां की मुर्गियों की संख्या अगले दिन घट जाती थी । नेताओ और कप्तान साहब के बड़े चहेते थे इंचार्ज साहब । खनन की और जंगलात से आने वाली गाड़ियों पर साहब की ऐंठती मूंछों का रहमोकरम था । मलाई मूंछ में थी या मूंछ मलाई में ये कहना कठिन था । किसी की क्या मजाल जो साहब की शान में गुस्ताखी कर दे । पत्रकार भी आगे पीछे खुशामद में लगे रहते थे आज वही पत्रकार इंचार्ज साहब की धांसू फोटो छापने में लगे थे । अरे साहब पुलिस ही काम आती है वो न हो तो जनता भूखों मर जाय । इंचार्ज साहब और उनकी पुलिस भगवान बन कर मोहल्ले मोहल्ले घूम रहे थे घूमना भी उन्हीं को था क्योंकि रोका भी उन्हीं ने था और इससे बढ़िया मौका क्या होता अपनी और पुलिस महकमे की इमेज बनाने का । फेसबुक पर लाइव वीडियो और साहब की जयजयकार कप्तान साहब और डीजीपी साहब तक पहुंच गई थी ।साहब की दरिया दिली देखकर  लाकडाउन में ढील के समय जगई साहब के पास फिर वही एप्लीकेशन लेकर थाने पहुंच गया  । फिर आ गया तू अबे तुझे पता नहीं जो खाना मैंने तुझे लाक डाउन में खिलाया था वो थाने को वहीं से बन कर आता था जिसके खिलाफ तू एफ आई आर लेकर आया है । "साहब लेकिन अपराध तो अपराध है" जगई बोला, मेरे अस्पताल का खर्चा सात हजार रूपए आया आज भी उठ नहीं पा रहा काम पर भी नहीं जा पा रहा हूं । 
  चल चल तेरी एफ आई आर के चक्कर में इलाके का सेठ खाना देना बन्द कर देगा । फिर मेरी इमेज कैसे बनेगी इसी साल प्रमोशन भी लेना है । अपना लाक डाउन भी तो ख़तम करना है डीजीपी साहब ने सभी थाने को पुलिस की इमेज बनाने को कह रखा है । चलो निकलो यहां से मुझे मलिन बस्ती में खाना बांटने जाना है ये कहते हुए इंचार्ज साहब गाड़ी में अपने मातहतों के साथ खाना बांटने निकल गए उधर जगई अपनी टूटी कमर और टूटी सायकिल के साथ वापस घर लौट पड़ा वो बड़ी देर से ये समझने की कोशिश कर रहा था कि ये इमेज आखिर क्या बला होती है जिसके लिए बड़े साहब से लेकर इंचार्ज साहब तक  इतने परेशान हैं।

Thursday, November 28, 2019

एक रोग ये भी-

पिछले रविवार को अखबार के मैट्रिमोनियल के विज्ञापन पर नज़र चली गई ।पहला कॉलम ब्राह्मणों का था कुछ कन्याओं या यूँ कहें महिलाओं के लिए वर की तलाश थी किसी विज्ञापन मे उम्र 30 साल थी किसी मे 40 और कही तो इससे भी ऊपर थी इनमे से अधिकतर की योग्यता पी जी या उससे ज्यादा थी कुछ तो नौकरी भी कर रहीं थीं । किसी किसी विज्ञापन में तो यहाँ तक लिखा था जाति बन्धन नहीं या सभी जाति मान्य । उत्सुकता वश लड़कों के विज्ञापन पर भी नज़र गई तो हालात यहां भी वही थे लड़के कम आदमी के विज्ञापन ज्यादा थे । प्रगति के इस दौर में जो प्रश्न मन मे कौंधा वो ये था कि युवा पीढ़ी इतनी देर से शादी क्यों कर रही है ?  ये किसी एक समाज की दशा नही है वरन हर समाज मे यही हो रहा है उसके पीछे एक तो कैरियर बनाने का चक्कर है कैरियर बन गया तो बराबरी का साथी चाहिए  । जिसे मिलने में कई मुश्किलें हैं मध्यस्थ रहे नही या अब कोई मध्यस्थता करना नही चाहता ,मां- बाप की सलाह सुननी नहीं तो समय से शादी कैसे हो । जब शादी की उमर है तो युवा पीढ़ी की अपनी जिद है समाज उनके लिए ठेंगें पर है । जब शादी का मन है तो मैच नही । मैच भी मिल गया तो बच्चे नही हो रहे बच्चे हो भी गए तो टेढ़े मेढ़े  हो रहे । अब वो तो होंगे ही बॉयोलॉजी कैरियर के लिए तो रुकेगी नही । तो ivf सेंटर की चांदी तो होनी ही है । सरकार नौकरी की उम्र सीमा बढ़ाती जा रही है उसी अनुपात में अधेड़ दूल्हे और दुल्हन भी बढ़ रहे हैं एक ऐसी नई पीढ़ी पैदा हो रही है जो दादा दादी या नाना नानी देखने को सौभाग्य समझेगी । समाज के इस रोग को जल्द ही पकड़ना होगा नही तो हर गली मोहल्ले में आई वी एफ सेंटर नज़र आएंगे । संपन्नता तो सम्पूर्ण होगी लेकिन सन्तान की विपन्नता उस पैसे से नही भर सकेंगी। और हाँ जब 40 साल के हो गए तो जाति बन्धन तो मजबूरी में हटाना पड़ेगा। समाज क्या खाक मदद करेगा वो तो वैसे भी अमूर्त ही है। -(साभार )