किसी भी धर्म के नाम पर पशु हत्या सभ्य समाज पर प्रश्न चिन्ह है चाहे बकरीद हो या देवी पूजा। किसी कानून के बजाय धार्मिक गुरुओं व् समाज सुधारकों को स्वयं पहल करनी होगी। बेजुबानों की कीमत पर हम त्यौहार क्यों मनाते हैं ? क्या उत्सव का यही एक तरीका बचा है.?
Wednesday, September 24, 2014
Wednesday, July 16, 2014
Sunday, June 8, 2014
For quality education-
जुलाई मे जब तक सरकारी स्कूल अँगड़ाई ले रहे होंगे तब तक पब्लिक स्कूल आधा कोर्स खत्म कर चुके होंगे . Think to convert government schools into Modern Model Schools.This is time for QUALITY Education . In India still majority of students r covered by govt.schools.(Modernization does not mean privatization.
Wednesday, June 4, 2014
अनाथ सड़कें-
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार हिंदुस्तान में रोड एक्सीडेंट में रोजाना 461 लोग मारे जाते हैं अर्थात वर्ष भर में 1,68,265 -कहने का तात्पर्य यह है कि एक साल में एक क़स्बा इतिहास बन जाता है । यह संख्या मामूली नहीं है। कुछ बेहतर तकनीक का प्रयोग कर इन घटनाओं को कम किया जा सकता है। प्रत्येक सड़क पर डिवाइडर के निर्माण और पैराफीट बना देने, फुटपाथ को अतिक्रमण मुक्त कर देने से भी बहुत घटनाएँ रोकी जा सकती हैं। सरकार को आम जनता से भी सुझाव जरूर लेना चाहिए। सड़कों को अनाथ नहीं छोड़ा जा सकता आखिर सड़कें विकास की सबसे अहम कड़ी जो हैं. -ललित
Friday, April 25, 2014
गली मोहल्ला संस्करण -
मीडिया खास तौर से अख़बारों और रीजनल चैनल पर स्थानीय घटनाएं जिस तरह जगह घेरती जा रही हैं उसको देखकर लगता है कि कुछ दिन बाद किस घर- किस किचन में क्या खाना बना यह भी इनमें प्रकाशित होगा। आपत्ति इस बात पर नहीं वरन प्रश्न यह है कि देश दुनिया की खबर कहाँ से पढ़ी जाय ? इनके पेज का आधे से ज्यादा विज्ञापन होता है। विज्ञापन किसी अखबार और मीडिया में कितना होगा इसकी भी कोई सीमा नहीं। होगी भी तो पाठक क्या कर लेगा ? पढ़ते रहिये आज फलां गांव के फलां स्कूल में बकरी चरने आयी और इस मोहल्ले में कुछ लोगों को कुत्ते ने दौड़ा लिया। फ़िलहाल अगर मार्केटिंग बढ़ाने का यही तौर तरीका रहा तो अगले कुछ दिनों में गली मोहल्ला संस्करण पढ़ने के लिए तैयार रहिये,कम से कम पराठा लपेटने के काम जरूर आएगा । इक्के (तांगे ) का घोड़ा फिर भी दूर तक देख लेगा लेकिन इक्कीसवीं सदी के हिन्दुस्तान को गली-मोहल्ले वाले चौथे खम्भे के आगे पीछे घूमना ही बदा है।Exceptions r everywhere . -(सत्यमेव जयते)
Saturday, April 12, 2014
टक्सालें-
हिन्दी के मूर्धन्य मनीषी डॉ कुश अक्सर कहा करते हैं कि टक्सालें ही खराब हो जांय तो अच्छे सिक्कों की उम्मीद नहीं की जा सकती। कुछ चयन आयोगों को देखकर तो फिलहाल इस बात पर धीरे -धीरे यकीन बढ़ चला है। कर भी क्या लेंगे? जिस देश में कुलपति और शिक्षा आयोगों के मुखिया राजनैतिक पकड़ और धनबल के आधार पर बन ने लगे हों वहां शिक्षा की दुर्गति होने में बहुत ज्यादा समय नहीं लगेगा। लेकिन इसकी कीमत पूरे देश को जरूर चुकानी पड़ेगी।
Saturday, April 5, 2014
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