Sunday, October 6, 2019

Brains and drains-

Countries
Only political boundaries
For great brains
'O' dear birds , river and drains
Why you do not follow countries' rules.
Do you know visa is compulsory
'O' dear friends -said the drains
Boundaries are only for brains, not for drains.-Lalit

Wednesday, August 8, 2018

मूर्ख कौन-

 हर बार की तरह विक्रम ने बेताल को कंधे पर टांगा और चल दिया । बेताल भी बहुत चालाक था उसने कहा राजन तुम बहुत मेहनती हो इतनी मेहनत क्यों करते हो ? एक कहानी सुनाता हूँ सुनो और मेरे प्रश्न का जवाब दो । बहुत समय पहले एक राजा था आलसी , भ्र्ष्ट और नकारा । उसके राज्य में कोई काम बिना पैसे लिए नही होता था । जनता ने त्रस्त होकर एक होनहार युवक को राजा बना दिया । ये राजा अद्भुत था लेकिन सख्त था । हर तरह के भ्र्ष्टाचार पर रोक लगाने के लिए लम्बी लम्बी योजनायें बनाई । युवाओं ने रोजगार मांगा तो कहा पहले सिस्टम सुधार लें ।अभी देश कर्ज में डूबा हुआ है रोजगार और नौकरी बांटने से देश दिवालिया हो जाएगा। आप लोग स्वरोजगार कर लो ।
   कुछ समय बाद उस आलसी और भ्र्ष्ट राजा ने गद्दारों से मिलकर फिर से  राज्य पर कब्जा कर लिया । ईमानदार राजा के समय से लेकर जितने पद खाली हुए थे सब पर लाखों रुपए घूस लेकर हज़ारों नियुक्तियां कीं । ईमानदार राजा हाथ मलता रह गया ।
  कहानी यहीं खत्म नही हुई मित्रों जनता ने फिर तख्ता पलट किया और ईमानदार राजा को फिर गद्दी दे दी लेकिन अब उसके पास जो अमला था वो उसकी हर योजना पर पानी फेर दे रहा था । बेताल ने विक्रम से पूछा राजन अब बताओ "मूर्ख कौन था "?  जवाब दोगे तो मैं वापस उड़ जाऊंगा और नही दोगे तो तुम्हारे सर के टुकड़े टुकड़े हो जाएंगे । आप ही बताइए विक्रम ने क्या जवाब दिया होगा?

Tuesday, January 16, 2018

हमें पागल ही रहने दो (पार्ट-2)-

         इस सीरीज के भाग दो में जिस पागल का जिक्र करने जा रहा हूँ उन्होंने अपनी जिंदगी को सिर्फ और सिर्फ अपने अंदाज में जिया है इस बात से उन्हें कोई फरक नहीं पड़ता कि लोग उनके बारे में क्या कहेंगे।  लेकिन हाँ जिसकी जिंदगी को छुआ तो उसको हिला के रख दिया।  इस अजीबोगरीब शख़्स का नाम राजकुमार सिंह है जिन्हें प्यार से लोग आर. के. सिंह कहते हैं। हम इस सनकी बादशाह को "बाबा" कहते हैं।  कानपुर के हाथीपुर गांव के आर के सिंह कम्पटीशन की तैयारी करने जब इलाहाबाद गए तो कुछ ऐसे लोगों की संगत में आ गए जो फक्क्ड़ मिजाजी थे इन फक्क्ड़ मिजाजियों में ज्ञानेश कमल,रविराज सिंह जैसी हस्तियों  के नाम प्रमुख हैं। पढ़ाई के साथ -साथ माघ मेले में संगम तट की धूल फांकते इन घुमक्क्ड़ों ने आध्यात्मिक रंगबाजी सीख ली जो हमेशा हमेशा के लिए उनके पीछे पड़ गई। बिना टिकट कानपुर से इलाहाबाद की यात्रा करने वाले आर के सिंह एक बार गुंडे के भ्रम में पुलिस के हाथों पड़ते-पड़ते बचे  सही समय पर दो डिब्बों के बीच की कपलिंग में छुप छुपा के इलाहाबाद पहुंचे आर के सिंह को ये नया ज्ञान बहुत कुछ दे गया। अब पढ़ाई के साथ आर के सिंह कोचिंग चलाने और जानवरों का इलाज सीखने लगे।  इस सीखने के दौर में लावारिश पड़े मृत जानवरों की खुद चीरफाड़ कर पूरी एनिमल फिजिओलॉजी उन्हें समझ में आ गयी।  पशु डॉक्टर के रूप में धीरे धीरे किसानों के भगवान बन चुके आर के सिंह को फिर याद आया कि नौकरी भी तलाशनी है इस बार फिर से मेहनत की तो गन्ना इंस्पेक्टर बन गए।  नौकरी तो मिल गई लेकिन फक्क्ड़ मिजाजी से इश्क़ बरकरार रहा। शादी हुई बच्चे भी हुए लेकिन आर के सिंह के अंदाज में कोई फरक नहीं आया पत्नी कानपुर अपने माँ बाप को नहीं छोड़ना चाहती थी तो आर के सिंह अपने जीने के अंदाज को। तो समझौता ये हुआ कि तुम अपने अंदाज से जियो और हम अपने अंदाज से जीते हैं।
                   गन्ना विभाग में काम करते करते आयुक्त सूर्य प्रताप सिंह उन्हें श्री श्री रविशंकर जी की आध्यात्म धारा की ओर ले गए। संयोगवश लख़नऊ के उसी विभाग में मेरी भी ज्वाइनिंग हो गई जिस में आर के सिंह थे वैसे तो मेरा और बाबा का कोई वास्ता नहीं था लेकिन कुछ ऐसा हुआ कि हम दोनों एक दूसरे से परिचित हो गए ये दोस्ती कब परवान चढ़ गई पता ही नहीं चला।  आर्ट ऑफ़ लिविंग के कोर्स में पहली बार मुझे मुफ्त में (उस समय फीस 600 रूपये थी )घुसाने वाले आर के सिंह ने मुझे एक नई विधा से जोड़ दिया। उसके बाद जब मैंने विपस्सना कोर्स किया तो मै आर के सिंह को विपस्सना में भेजने की सोचने लगा डर ये भी था कि बात मानेंगे भी या नहीं। खैर मेरा ये डर निर्मूल था बाबा खुद ही साधना के लिए तैयार बैठे थे दस दिन बाद जब साधना से लौट के आये तो सच में बाबा "पागल" हो रहे थे।  मस्त मौला आर के सिंह अब फुल मनमौजी हो गए थे खाना मिले चाहे न मिले जीवन के आनंद को बाँटना उनके लिए जरूरी काम था।  इसी बीच स्वामी मुक्तेश्वर भारती को भगवा से जींस तक उतार लाने का काम और उनकी जिंदगी को नव सन्यास में दीक्षित करने का काम भी बाबा ने कर डाला आज दोनों बहुत घनिष्ठ मित्र हैं लेकिन स्वामी मुक्तेश्वर भारती  की जिंदगी में कपड़े के सन्यास को आत्मा के सन्यास में बदलने का काम आर के सिंह ने ही किया। कभी मोटर साइकिल तो कभी सेकंड हैंड कार से आज भी आर के सिंह लखनऊ से कानपुर तक घूम डालते हैं।  गन्ना विभाग उनका ठिकाना जरूर है लेकिन वो कब वहाँ मिलेंगे -कब नहीं कोई नहीं बता सकता। नौकरी से बुरी तरह त्रस्त आर. के. सिंह की इच्छा यह भी है की नई पीढ़ी के बच्चे बेलौस अंदाज में जिएं।  पुराने ढर्रों पर चल रही जिंदगी को वो 180  डिग्री पर मोड़ देना चाहते हैं और इस रिस्क को भले कोई अभिभावक न स्वीकारे पर बच्चे उनके फैन हो ही जाते हैं। समाज के नियम कायदों को झटका देते रहने वाले इस सनकी और मस्त मलंग को उनकी जिंदगी उनके ढंग से मुबारक। -ललित 

Monday, January 15, 2018

हमें पागल ही रहने दो - (पार्ट -1)-


       दुनिया में बहुत से लोगों से मुलाकात हुई। लोग आये और गए लेकिन इस सफर में कुछ ऐसे अनूठे पागलों से मुलाकात हुई जिन्होंने दिल को छू लिया। ऐसे ही एक शख्शियत का नाम नीरज मिश्र उर्फ़ क्रांतिकारी है।  दिल्ली से जब डॉक्ट्रेट डिग्री लेकर वापस लौटा तो लखनऊ में बड़े भाई साहब के साथ रहने लगा साथ में गोपाल जी भी थे ।  नीचे के कमरे में नीरज जी अपने चार भाइयों के साथ रहा करते थे लखनऊ से दूर कुशीनगर जनपद से चारों भाई पढ़ने के लिए आये थे सबकी जिम्मेदारी नीरज जी पर थी । जब कभी नीरज जी मेरे कमरे में आते थे तो कुछ कविता की पंक्तियाँ जरूर पढ़ते थे।  उनकी पसंदीदा लाइनें किसी कवि की यूँ थीं -     
माटी की है देह रात भर जलना है
हमें अमावस की आँखों में गड़ना है
होगी सुबह कि इतना है विश्वास हमे
 हम हैं दिए सहेजो अपने पास हमें ... ,
इन्हीं उलझे दिमागों में घनी खुशियों के लच्छे हैं
हमे पागल ही रहने दो कि हम पागल ही अच्छे हैं   .
   नीरज जी लखनऊ यूनिवर्सिटी में  केमिस्ट्री में एम् एस सी  कर रहे थे। स्वभाव से विनम्र नीरज जी लख़नऊ यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति में कुछ सपना संजोते हुए नीरज मिश्र से नीरज मिश्र उर्फ़ "क्रांतिकारी जी" बन गए।  एक दो चुनाव लड़ने के बाद असफलता ने क्रन्तिकारी जी को कुछ नया सोचने को मजबूर कर दिया।  इसी बीच राजकुमार सिंह और राम कृष्ण मिशन निराला नगर लखनऊ ने उनके जीवन को अप्रत्याशित मोड़ दे दिया।  मिशन के ध्यान कक्ष में रोज जाते जाते क्रांतिकारी जी आध्यात्म की  तरफ बढ़ने लगे।  इसी बीच वर्ष 2010 में नीरज जी ने गौमुख से गंगासागर तक गंगा बचाओ अभियान छेड़ कर  गंगा जी की पूरी परिक्रमा पैदल ही कर डाली। जीवन के सत्य की  तलाश ने उन्हें क्रिया योग तक पहुंचा दिया।  आध्यात्म की लत इतनी तगड़ी लगी कि घर से भाग गए थक हार कर माँ बाप ने छोटे भाइयों की शादी कर के संतोष कर लिया लेकिन किस्मत में कुछ और भी होना था।  क्रिया योग की साधना में अपने गुरु के बहुत कृपापात्र क्रांतिकारी जी इटली जाकर लोगों को ध्यान सिखाने लगे।वहाँ भी नीरज जी का बहता मन समन्दर के तीरे-तीरे पुर्तगाल से स्पेन तक पैदल ही चल निकला इस शांति मिशन में उनके साथ कई विदेशी लोग जुड़ते गए।  नीरज जी जब यूरोप में किसी के घर जाकर खाना मांगते थे तो लोग उनको हैरानी से देखते थे लेकिन बाद में बहुत प्यार से खाना खिलाते थे।  नीरज जी की  जेब में कभी भी इतना पैसा नहीं रहा कि अगले दिन के बारे में निश्चिन्त हो सकें लेकिन ये चिंता कभी भी उनके चेहरे पर नहीं झलकी।  अंग्रेजी भाषा बोलने की समस्या हल करने में उनको सहयोग मिला सुश्री मैडेलेना बिलेकी का जो अब उनकी सहधर्मिणी हैं। बहुत प्रेम से भोजन बनाने और परोसने खिलाने वाले  मृदु भाषी और विनम्र नीरज जी ऋषिकेश के क्रियायोग आश्रम में कभी न कभी आपको जरूर मिल जायेंगे। उनका पागलपन आज भी कायम है यह उन्हें कहां तक ले जायेगा ये देखने वाली बात होगी। -ललित 

Sunday, December 31, 2017

छोटा बच्चा समझ के -


इस वर्ष न्यायपालिका ने कुछ ऐतिहासिक निर्णय दिए उनमे से एक यह भी था कि किशोर अपराधियों को बालिग माना जाय बालिग की तरह मुकदमा चलाया जाए । इस बात को पिछले दो तीन साल से मैं भी कई बार रख चुका हूँ । तकनीक और बढ़ती मेधा व बुद्धि नई पीढ़ी को 4 जी से न जाने कितने नए G तक पहुंचा चुकी है और हम हैं कि नई पीढ़ी को बच्चा समझते हैं । ये बच्चे नए ढंग से सोचते और करते हैं इनकी दुनिया बहुत तेज रफ्तार से आगे बढ़ रही है । हम आप इस बात पे तो खुश हो जाते हैं कि हमारा बच्चा बहुत शार्प है लेकिन जब वो अपने अधिकार चाहता है तो हम उसे डांट डपट कर चुप करा देते हैं ।अपराध यहीं से बढ़ते हैं जब हम उस की मनः स्थिति को समझने का प्रयास नही करते । पढ़ाई और तकनीकी के इस दौर में 13 साल का बच्चा हमारे जमाने की 20 वर्ष की आई कयू वाला हो गया है । हम अभी भी उसे 10+2+3 सिस्टम में पढ़ने को मजबूर करते हैं जबकि वह 10 या 12 साल में कुछ नया कर गुजरने या रोजगार करने को उतावला है । पहली बात तो उसे 12 वी के बाद ही रोजगार का हक मिल जाना चाहिए भले ही बारहवीं में आप स्नातक तक का ज्ञान उड़ेल दीजिये । 15 साल पढ़ाई कर के भी हम कौन सा रोजगार उसे दे दे रहे हैं । दूसरी बात लड़कों के विवाह की उम्र 21से घटा कर 18 कर देनी चाहिए । युवा मन देश की प्रगति की धीमी रफ्तार से संतुष्ट नही है वह सब कुछ बहुत तेज़ी से चाहता है जिन बदलावों को वो दुनिया मे देख और सुन रहा है उसे अपने देश मे होते देखना चाहता है । वो ये भी चाहता है कि देश के बदलाव में अपना योगदान दे किन्तु दुर्भाग्यवश 18 वर्ष के पहले उसे वोट देने का हक़ नही है । बताते चलें कि देश की आबादी का 41% 18 वर्ष से कम है ये इतना बड़ा हिस्सा है जो देश की लगभग हर नीतियों से प्रभावित होता है किंतु अपनी राय नही दे सकता । बच्चों और किशोरों पर हो रहे अत्याचार को बुढ्ढे लोग रोक नही पा रहे हैं और न ही किशोरों को नीति निर्माण में शामिल होने दे रहे हैं तो सुधार कैसे होगा ? जिसके पास बल और बुद्धि है उसके पास पॉवर नही जिसके पास पॉवर है वो थका हुआ है । इस स्थिति को बदलने की जरूरत है इसलिए 15 से 18 वर्ष के इस 5 G जेनरेशन को वोटिंग राइट अब मिल ही जाना चाहिए और साथ ही 15 वर्ष के ऊपर के सभी नागरिकों को व्यस्क माना जाना चाहिए । सिर्फ इतना करने से लगभग 8 प्रतिशत नए नागरिकों ( किशोरों )को देश की नीति बनाने में हिस्सा मिलने लगेगा । पढाई में लंबे समय तक फंसाने के बजाय बारहवीं के बाद ही रोजगार देने की नीति युवा ताकत को देश हित मे मोड़ेगी । कुछ लोग जो किशोर और बच्चों को कम बुद्धिमान मानते हैं उन्हें फिर से सोचने की जरूरत है । -सत्यमेव जयते

Sunday, November 19, 2017

सह वीर्यं करवावहै -

       हरिद्वार के उपजिलाधिकारी मनीष कुछ नए नए प्रयोग करते रहते हैं मनीष ने अभी हाल में सरकारी आवासीय विद्यालय अलीपुर व बाल कुंज बहादराबाद के बच्चों जिनमे ज्यादातर गरीब घरों से हैं को रॉयल पब्लिक स्कूल रोहालकी के बच्चों के साथ उनके कैम्पस में ट्रेनिंग दिलवायी ।तीनों स्कूलों के बच्चे एक साथ बैठे और आपस मे बातें भी की। इस कार्य मे पहल की रॉयल पब्लिक स्कूल के मालिक रजनीश चौहान ने ।इस पहल का साक्षी मै भी बना । ये प्रयोग इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि बढ़ते "एजुकेशनल डिवाइड " को कैसे कम किया जाय । एक तरफ सुविधा सम्पन्न अप टू डेट पब्लिक स्कूल है दूसरी तरफ बदहाल गरीब तबका ।यदि सारे पब्लिक स्कूल इस राह पर चल निकलें तो शिक्षा और देश की तस्वीर बदल सकती है । ज्यादा न सही पब्लिक स्कूल एक सरकारी स्कूल को तो गोद ले ही सकते हैं -

Sunday, June 18, 2017

Missing World -आ लौट के आ जा मेरे...

मेरे मित्र जो उत्तराखंड पुलिस सेवा के एक कर्मठ अधिकारी हैं श्री मनोज कत्याल जी  पिछले कुछ दिनों से एक गहरी पीड़ा से गुजर रहे थे हुआ यूँ कि उनके बुजुर्ग ससुर (बाबू जी )घर से कही जाने के लिए पैदल निकले और घर लौट के नहीं आये।  घर वाले खोज -खोज के परेशान हो गए।  शुगर और ब्लड प्रेशर की दवा घर पे छूटी हुई थी।  किसी अनहोनी की चिंता सबको घेरे हुई थी पुलिस विभाग होने के नाते हर जगह की पुलिस उन्हें मदद कर रही थी लेकिन बाबू जी का पता नहीं चल पा रहा था.  सोशल मीडिया से लेकर न जाने कितने तौर तरीके आजमाए गए सब असफल साबित हुए , सब निराश हो गए थे कि अचानक एक फोन ने उनके परिवार को जैसे जीवन दान दे दिया  हुआ यूँ कि बाबू जी ट्रेन  के पायदान से फिसल कर अनजान जगह में गिर गए , कई दिन अस्पताल में रहे, जेब में एक गैस बुकिंग  की रसीद पर घर का पता लिखा था बस इसी पते ने बाबू जी को फिर से उनके घर वालों से मिलवा दिया।  जब से मानव इस धरती पर संवेदनशील हुआ होगा परिवार तब से अस्तित्व में आया होगा।  माँ -बाप, भाई -बहन, दादा- दादी, नाना- नानी, बुआ, मामा जैसे रिश्ते  ईजाद हुए होंगे।  मन ने मन की भाषा पढ़ी होगी, दिल ने दिल के जज्बात समझे होंगे और परिवार के बंधन प्रगाढ़ हुए होंगे।  परिवार पालन -पोषण ,संस्कार ,शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के आधार बने होंगे। परिवार से बाहर जीवन दुःखद न सही तो आसान आज भी नहीं है।  इस दुनिया में बहुत से लोग ऐसे हैं जो जाने अनजाने अपने प्रियजन और परिजनों से बिछड़ जाते हैं. होते वो इसी धरती पर हैं पर उनका मिलना मुश्किल हो जाता है कुछ किस्मत वाले होते हैं जिनके अपने उन्हें मिल जाते हैं लेकिन सबकी किस्मत इतनी अच्छी नहीं होती। बहुत से भटके लोग दर -दर भटकते रहते हैं कभी खाना नहीं मिलता कभी पानी नहीं मिलता। कभी बारिश में भीगना पड़ता है कभी ठण्ड में काँपना ।बीमारी आती भी अपने मन से है और जाती भी अपने मन से है।   हिंदुस्तान में ऐसे लोग शहरों कस्बों और गाँव -देहात में कहीं भी देखे जा सकते हैं।  इन्हे देख कर आप के मन में भी विचार तो जरूर आता होगा कि ये कौन लोग हैं ?क्या इनका कोई घर नहीं ?क्या इनका कोई परिवार नहीं ? आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ हिंदुस्तान  में 270 औरतें और 180 बच्चे प्रतिदिन खो जाते हैं जिनमे से लगभग एक चौथाई का पता नहीं चल पाता है।  पुलिस और मीडिया की भाषा में इन्हे मिसिंग परसन कहा जाता है।  अक्सर आप अख़बारों में खोये हुए लोगों के विज्ञापन देखते होंगे टीवी और रेडियो  पर उनके विवरण सुनते होंगे दीवारों, बसों  पर पोस्टर देखते होंगे लेकिन सोचते होंगे मुझे क्या लेना-देना इनसे और हाँ पता नहीं कहाँ होंगे ये ? कौन इस में दिमाग खपाये।  लेकिन इस दर्द को उस मां -बाप के पूछिए जिसका बच्चा खो गया है उनकी पूरी जिंदगी इस टीस के साथ गुजरती है जिसे वो बयाँ नहीं कर पाते, सिर्फ घुट -घुट के जीते हैं ।  यही हाल उन बच्चों का होता है जिनके मां या बाप कहीं खो जाते हैं। जो खो जाते हैं उनकी जिंदगी प्रायः बड़े बदतर हालातों से गुजरती है खासकर वे बच्चे जो छोटे होते हैं या वे बुजुर्ग जिनकी मानसिक अवस्था सही नहीं होती।  बहुत कम महिलाएं भाग्यशाली होती हैं जिन्हे किसी शरणालय में जगह मिलती है ज्यादातर औरते और बच्चे अपराध पेशा गिरोह के हत्थे चढ़ जाते हैं और ताउम्र उस गिरोह की कीमत चुकाते रहते हैं भीख मंगवाने,मजदूरी ,देह व्यापार से लेकर उनकी  किडनी और लिवर का धंधा भी ये गिरोह बड़े शातिराना अंदाज में करते हैं।कच्ची उम्र में बेहतर जिंदगी की चाहत बहुत से बच्चों को होती है जो घर से भाग जाते हैं लेकिन उन्हें क्या पता माँ बाप हर जगह नहीं मिलते।  उपेक्षा के शिकार बुजुर्ग या याददाश्त खो चुके बुजुर्ग अक्सर अनाथ से घूमते रहते हैं।
            देहरादून में ऐसे लोगों के लिए काम कर रहे "हेल्पिंग हैंड" संस्था के संचालक डॉ अंजुम बताते है कि घंटाघर चौराहे पर भीख मांगने वाले बच्चों की जेब नहीं होती। वो हर पांच दस मिनट बाद अपने बॉस ,जो किसी किनारे खड़े होकर उन्हें वाच करता है ,को पैसा दे आते हैं और फिर भीख मांगने में जुट जाते हैं शाम को ये बच्चे वहां नज़र नहीं आते और अगली सुबह फिर आ जाते हैं। बच्चों को ढूंढने में सबसे बड़ी समस्या ये होती है कि बच्चों का चेहरा उम्र बढ़ने के साथ-साथ बहुत तेजी से बदलता है पांच या छः साल बाद खुद माँ बाप को भी वो घूमते हुए अचानक मिल जाय तो शायद वे भी न पहचान पाएं।  हिंदुस्तान में संभवतः इसीलिये हाथ में नाम और पता गोदवाने की परम्परा खूब प्रचलित थी।  पागल और भिखारी के रूप में फुटपाथ पर रहने वाले बहुत से लोग दरअसल घर से भटके हुए लोग होते हैं जो अपना घर भूल जाते हैं और  जिन्हे उनके घर वाले तलाश रहे होते हैं।  शरणालयों में रह रहे बहुत से लोग अपने लोगों के पास जाना चाहते हैं लेकिन वो घर का पता नहीं बता पाते ऐसे लोगों के घर को पता करने के लिए बहुत सूझ -बूझ की जरूरत होती है जैसे भाषा ,बोली, पहनावा ,खान-पान की पसंद आदि।  संवासिनी गृह देहरादून में ऐसे लोगों पर जब यह प्रयास किया गया तो परिणाम आशातीत रहे।वन सेवा के एक संवेदनशील ईमानदार अधिकारी रामचंद्रन जी  ने न जाने कितने परिवारों की खुशियां वापस लौटा दी. तमिलनाडु ,उड़ीसा ,नेपाल के लोग जो अपनों को वापस पाने की आशा खो चुके थे उनके अपनों का वापस मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं था। फुटपाथ पर पड़े लोगों को घर तलाशने में डॉ अंजुम और उनकी युवा टीम जिसका सदस्य मै भी रहा ने मिशन घर वापसी की शुरुआत की उनकी टीम ने इस काम में  दिन रात एक कर दिए और बहुत से लोगों को उन्होंने उनके परिजनों से मिलवाने में  अहम भूमिका निभाई। डॉ अंजुम और उनकी टीम दिन में एक घंटा ऐसे लोगों के पास गुजारती है और उनको अपना बना कर उनके घर का पता लगाती है इस नेक काम के चलते आज कई घरों की दुवाएँ उनके खाते में हैं।  ये सिलसिला फेसबुक पर कुछ नेक लोगों ने नो मोर मिसिंग और मिसिंग पीपल इन इंडिया के नाम से भी जारी रखा है जिसमे जुड़ने वालों की तादात लाखों में है और उनके साथ है सफलता का अनकहा आनंद जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है । कई प्रदेशों की पुलिस मिसिंग पर्सन की सूचना अलग साइट पर डालती है उसे सीसीटीएनएस से जोड़ने की पहल हुई है।  इस सबके बावजूद ये प्रयास जन सहयोग के बिना  नाकाफी हैं। "आधार " इस दिशा में नई उम्मीद की किरण है जिससे भटके हुए आदमी के घर का पता लगाया जा सकता है।बच्चों के लिए यह आधार बहुत ही सहायक हो सकता है।  लेकिन इस सबके लिए समय और प्रयास की जरूरत होती है जो इस भागदौड़ भरी दुनिया में बहुत कम लोगों के पास है। फिर भी  आदमी को ट्रेक करने का सॉफ्टवेयर या बायो-चिप  जब तक ईज़ाद नहीं हो जाती ये प्रयास हम सबको जारी रखना होगा क्या पता किसी को उसकी खोयी हुई दुनिया वापस मिल जाय। -ललित