Saturday, March 12, 2022

S for Science: Part -2

 'S For Science'

Part 2

विज्ञान की दुनिया में जो होता है उसे समझा जाता है कि ऐसा क्यों होता है 

अब ये प्रश्न मन में आता होगा कि दीवार पर सीलन क्यों आ जाती है ? पानी क्यारी में एक जगह डालो और नमी दूर तक दिखती है ?

यह सब कोई चमत्कार नहीं विज्ञान की भाषा में इसे कैपिलरी एक्शन कहते हैं।  सरल भाषा में बात करें तो कैपिलरी एक बहुत पतली नली होती है जिसकी खूबी यह है कि इसका एक्शन सामान्य पाइप या नली से भिन्न होता है।  हम सबको यह पता है कि झील , तालाब की गहराई कितनी भी हो उसकी सतह एकसार होती है लेकिन जब हम उसमे पतली नली डुबा दें तो नली में जल सतह से ऊपर उठ जाता है. इसको इस तरह समझिये कि कोल्ड ड्रिंक के गिलास में जब स्ट्रॉ डाल दिया जाता है कुछ ऊंचाई तक पानी अपने आप चढ़ जाता है। 

तराई के उत्स्रुतब नलकूप इसी सिद्धांत पर कार्य करते हैं।  पेड़ अपनी जड़ों से पानी इसी क्रिया से ग्रहण करते हैं। 

आसान उदाहरण घर में आरती की बाती है रुई के बीच बनी पतली कैपिलरी से तेल अपने आप ऊपर चढ़ता रहता है और दीपक जलता रहता है। घरों में सीमेंट में आने वाली सीलन उसके बीच बनी बहुत महीन नली  चढ़ा हुआ पानी है ये नली इतनी महीन या पतली होती है कि हमें दिखती भी नहीं।  

और हाँ नहाने के बाद तौलिया जो पानी को सोख लेता है उसका राज भी यही है। 

और फिजिक्स की भाषा में हम इसे कैपिलरी एक्शन कहते हैं। 


आपको ये सीरीज कैसी लगी अपना फीडबैक देते रहिये और पढ़ते रहिये ... 

'एस फॉर साइंस '

Monday, February 28, 2022

'S for Science'

  बहुत दिनों से मन था कि हमारी जिंदगी में रोज ब रोज के विज्ञान को सरल भाषा में लिखा जाय जिसमें पारम्परिक ज्ञान को भी समाहित किया जाय ।  आज २८ फरवरी को  विज्ञान दिवस पर  इस सीरीज की शुरुआत करने का विचार मन में आया।  वैसे तो बिना विज्ञान हमारी दिनचर्या अधूरी रहती है लेकिन शायद ही हमारा ध्यान इस पर कभी जाता है 

जैसे कि नींद एक निश्चित समय पर टूट जाती है विज्ञान की भाषा में हम इसे बायो क्लॉक कहते हैं 

जैसे कि हमें भूख और प्यास लगती है आसान शब्दों में शरीर का यह मेटाबोलिज्म है 

जैसे कि मिर्च तीखी लगती है क्योंकि उसमें कैप्सिसिन रसायन होता है 

जैसे कि ऊनी कपड़े में रगड़ होने पर बिजली सी चमक जाती है क्योंकि इलेक्ट्रिक सर्किट बन जाता है 

इस तरह के ढेर सारे सवाल जाने अनजाने मन में उठते होंगे कुछ का जवाब मिल जाता है कुछ का नहीं मिल पाता है 

वैसे विज्ञान अपने में रोचक है ये और भी रोचक हो जाता है जब इसकी जड़ पकड़ में आ जाय।  रोजमर्रा की जिंदगी के कुछ वैज्ञानिक पहलुओं की चर्चा इस सीरीज में करते रहेंगे।  आपकी भागीदारी और टिप्पणी इसे और सरल बनाएगी ऐसा विश्वास है 

एसिडिटी होने पर माँ नींबू पानी पीने को क्यों देती है ?

एसिडिटी पेट में अम्ल यानी एसिड बढ़ने का संकेत है अब जब एसिडिटी बढ़ी तो माँ ऐसी चीज पीने को क्यों कह रही जिसमे एसिड है क्योंकि नींबू भी अम्लीय है ।  लेकिन माँ का विज्ञान अनुभव आधारित है और फायदा भी कर जाता है आइये इसे विज्ञान के नज़रिये से समझते हैं 

    रसायन विज्ञान में बफर सोल्युशन का नाम तो सुना ही होगा बफर सोल्युशन कमजोर अम्ल या कमजोर क्षार वाला द्रव्य होता है जो pH में बदलाव को रोकने का काम करता है , कहने का मतलब ज्यादा अम्लीय या क्षारीय को अपने बराबर लाने या न्यूट्रल करने की कोशिश कर उसे कमजोर कर देता है 

अब नींबू में जो एसिड है वह कमजोर एसिड है और पेट में जो एसिड बना है वो स्ट्रांग एसिड है नींबू पानी बफर सोल्युशन का काम कर के पेट के एसिड के pH  को न्यूट्रल की तरफ ले जाता है इसलिए मम्मी का फार्मूला कामयाब हो जाता है 

इसी तरह जब मधुमक्खी काट लेती है तो उस पर नींबू या नमक का पानी मां रगड़ देती है और आराम मिल जाता है होता यूं है कि मधुमक्खी के डंक मारते समय फॉर्मिक एसिड शरीर में चला जाता है जिससे असहनीय दर्द होता है।  जब नींबू या चूना लगा दिया जाता है तो फॉर्मिक एसिड कमजोर पड़ जाता है और आराम मिलने लगता है। 

तो है न रोजमर्रा  का विज्ञान इतना आसान। 

शेष अगले अंक में 

पढ़ते रहिये 'एस फॉर साइंस '

- डॉ ललित नारायण मिश्र 


Wednesday, February 16, 2022

Saturday, June 19, 2021

किसुली

 किसुली-


     गौहन्ना और अवध में आम के बीज को किसुली कहते हैं । किसुली नाम इसलिए अब तक याद है कि जब आम छोटा और कच्चा होता था तो उसकी किसुली बहुत छोटी सफेद और बिना जाली की होती थी कच्चे आम को फोड़ते ही वह हाथ में आ जाती थी । ये किसुली पकड़ते ही फिसलती थी इसलिए इसके साथ एक मजेदार वाकया जुड़ा हुआ था । किसकी शादी किस दिशा में होगी ये किसुली के उछलने की दिशा पर निर्भर था  किसुली को अंगूठे और तर्जनी के बीच में रखकर उछाला जाता था या यूं कहें कि दबाया जाता था और  किसुली जिधर की तरह उछलती थी मान लिया जाता था कि उस तरफ उस बच्चे की शादी होगी । अब यह उछालने का क्रम हम बच्चों के लिए मनोरंजन  और खुशी दोनों का साधन था।


   अवध क्षेत्र में फलों का मतलब ज्यादातर आम से ही था वहां आम के न जाने कितने बाग होते थे। बागों के नाम भी अलग-अलग तरह के होते थे जैसे भवानी बगिया, दसवन तारा , बझरैया,  गौरैया बाबा,  कारे देव बाबा , घेरवा जैसे न जाने कितने तरह के नाम बाग- बगीचों के होते थे। इन बगीचों में  तरह-तरह के आम होते थे कोई भी दो पेड़ के आम एक टेस्ट के नहीं होते थे कुल मिलाकर हर बार हर बाग आम की जैव विविधता का भंडार था । अचार बनाने वाला आम मोटा होता था। रसीले आम केवल खाने के काम आते थे । खटाई का आम अलग होता था । जब आम की पूरी बहार आती थी तो उसका अमावट पड़ता था । अमावट के लिए आम का रस और गूदा निकाल कर किसी कपड़े के ऊपर धूप में सुखाया जाता था सूखने के बाद रोटी की तरह उसे लपेट दिया जाता था । इसे साल भर कभी भी खा सकते थे ।


     सिंधुरिया आम सिंदूर के रंग का होता था ।  मॉल दहवा आम मोटा होता था , खट्टहवा आम बहुत खट्टा होता था कहते थे कि अगर इसे मुर्दे को खिला दो तो वो भी उठ कर भाग जाएगा । इसी तरह बहेरी आम सबसे छोटा होता था और  एक ही बार में उसे पूरा मुंह में भर सकते थे  । तोतहवा आम की चोंच निकली होती थी। इनका वैज्ञानिक नाम भले न था पर इस तरह आम के न जाने कितने प्रकार और उनकी किस्में गांव में मौजूद थी। बताते हैं कि एक लाख देशी वेराइटी के आम के बाग भी राजाओं के पास थे जिसे लक्खी बाग कहते थे ।  एक खास बात हर आम के साथ थी कि उसकी चोपी निकालनी पड़ती थी।  यह चोपी डंठल के पास जमा हुआ एसिड होता था अगर यह मुंह में चला जाता था तो खांसते खांसते बुरा हाल होता था।हर बाग हर साल फलता था चाहे दो चार पेड़ों पर ही बौर आएं आते जरूर थे । बौर आने के समय आम के नीचे से अगर गुजर गए तो भुनगे यानि छोटे -छोटे कीड़े बहुत बुरा हाल करते थे । 


     आम बीनने के चक्कर में हम बच्चों के बीच अक्सर अधिकार को लेकर कहा सुनी और मार पीट हो जाती थी । कभी कभी बच्चों की यह लड़ाई खतरनाक रूप से बड़ों की लड़ाई बन जाती थी और एकाध बार लाठियां चलने की नौबत आ जाती थी । आम के सीजन के बाद फिर से पुराना मेल -भाव बहाल हो जाता था। हालांकि आम ही ऐसा फल था जो सबको मिल पाता था इसलिए उर्दू में सर्व सुलभ को आम कहा जाने लगा जैसे कि आम जनता, आम रास्ता । बताते चलें कि आम्र संस्कृत भाषा का शब्द है जिसे उर्दू ने शायद स्वीकार कर लिया होगा ।


   आम के ही सीजन में जामुन का भी फल आता था कहते थे कि भगवान ने एक तरह मीठा आम दिया तो दूसरी तरफ उसकी मिठास से शुगर न  बढ़ जाए इसलिए जामुन पैदा किया । अगर ज्यादा आम खा लिया तो दो चार जामुन खाना जरूरी होता था जिससे कि आम पच जाए। आम के ही सीजन में आम पकने के दौरान बारिश भी होने लगती थी जिससे बाग बगीचों मैं पानी  भर जाता था अक्सर आम बीनने के लिए घुटने घुटने पर पानी में मेहनत करनी पड़ती थी। इस दौरान सांप और बिच्छू जैसे खतरनाक जानवरों से भी सामना करना पड़ता था। अगर झापस लग गया तो समझो आम भदरा गया यानि आम को अब बीनना भी श्रम साध्य हो जाता था, उस समय इतना आम गिरता था कि बाग को बुहारना पड़ता था ।


 अस्सी के दशक बीतते -बीतते कलमी आम का दौर अवध क्षेत्र में शुरू हो गया था । देसी पेड़ धीरे धीरे खत्म होने लगे  । बाग बगीचों में लोगों ने कलमी पेड़ लगाने शुरू कर दिए  । कलमी आम के अच्छे दाम मिलते थे और किसानों को जमकर आमदनी होने लगी। रसायनिक  कीटनाशकों और फ़र्टिलाइज़र का खूब उपयोग होने लगा । देसी पेड़ों को तो कोई खाद पानी भी नहीं पूछता था । धीरे धीरे अवध क्षेत्र से देसी पेड़ लगभग लगभग लुप्त प्राय हो गए और नेचुरल जीन बैंक धीरे धीरे स्वयं ही समाप्त होने लगा । देसी पेड़ लंबे समय तक फल देते थे कुछ पहले शुरु हो जाते थे और कुछ बहुत बाद तक फल देते थे । आखिर तक फल देने वाला पेड़ हमारे बाग में सवनहा के नाम से जाना जाता था । गिलहरी और चिड़ियों के कटे आम खासकर तोते के अधखाए कच्चे आम से पकते हुए सावन तक के आम अब गौहन्ना में छोटे कद के कलमी आम की भेंट चढ़ चुके हैं । दो- चार देशी आम के बाग अब भी वहां  किसी बुजुर्ग की तरह गांव की बदलती आबो हवा को देख रहे हैं और अपने दिन गिन रहे हैं । देशी आमों का वैविध्य पूर्ण साम्राज्य पूंजीवादी कलमी आमों की भेंट चढ़ चुका है ।देशी आमों के दौर में पहले कोई किसी को आम खाने से मना नहीं करता था बाग चाहे जिसका हो, लेकिन अब तो कलमी आमों के बाग में मजाल है कि दूसरा कोई घुस जाय ।


    जब आम के बीज यानि किसुली इठला  कर पेड़ बनने लगती थी तो हम बच्चे उसकी सीपी बनाते थे जो कई तरह की  ध्वनि निकालती थी । अमोला यानि आम का पौधा जैसे ही बड़ा हो जाता था वो फिर किसी बाग का हिस्सा बना दिया जाता था। देशी आम और अमोलों की पीढ़ी रोजगार की तलाश में शहर को जा चुकी है ।  सुना है कुछ प्रकृति प्रेमी फिर से देशी आम के बीज इकठ्ठा कर लगवा रहे हैं । क्या पता आम की ये देशी किसुली किस दिशा में गिरेगी और लहलहा कर लंबे पेड़ के रूप में खड़ी हो जायेगी और रिसर्च पेपर छपेंगे " गांव में फिर मिला आम का जीन बैंक" । वैसे हम तो किसुली को ही श्रेय देंगे जो शादी कराती थी।


(गौहन्ना डॉट काम पुस्तक का अंश )

Monday, May 10, 2021

 #जंगहैतोढंगसेलड़िए-


भरोसा भारतीय ज्ञान का 


 आज के समय में जब बहुत सी दवाएं काम नहीं आ रही हैं तो समय आ गया है कि मुड़कर भारतीय पारंपरिक ज्ञान की तरफ देखा जाए। इसे विज्ञान की भाषा में इंडियन ट्रेडिशनल नॉलेज यानी आई टी के कहा गया है।


  सीएसआईआर ने लगभग 4000 फॉर्मूलेशंस अपने डिजिटल लाइब्रेरी में भारतीय पारंपरिक ज्ञान से रजिस्ट्रेशन किए हैं लेकिन समस्या यह है इसे बोले कौन?


  बहुत से फार्मूले भारतीय संस्कृति में पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे हैं । लोग प्रयोग कर रहे हैं और ठीक भी हो रहे हैं ऐसा नहीं है कि अब तक रोग और  व्याधियां नहीं होती थीं । होती थी और इनको इलाज करने के पारंपरिक तरीके हुआ करते थे एलोपैथी के आने के पहले भी बहुत सी  इलाज की पद्धतियां थी जिससे सदियों से लोग ठीक होते आए हैं । योग और आयुर्वेद वात- पित्त -कफ को ही केंद्र मानकर इलाज करताहै । आयुर्वेद तो एक तिहाई रोगों का कारण कफ को ही मानता है और आयुर्वेद में कफ उपचार पर जम के शोध हुए हैं और न जाने कितनी औषधियां बनाई गई हैं । योग और आयुर्वेद को कफ निकालना भी आता है और जड़ से बीमारी खत्म करना भी आता है । ये भरोसा जरूरी है । लेकिन आपको भी भरोसा है क्या ?


  अगर हम सिर्फ आयुर्वेद की बात करें तो सबसे ज्यादा कार्य आयुर्वेद में हुआ है तो कफ और कब्ज पर हुआ है भारतीय योग की पद्धति में प्राणायाम पद्धति फेंफड़े  की क्षमता बढ़ाने पर आधारित है । कपालभाति, अनुलोम-विलोम यह सब फेफड़े की क्षमता बढ़ाने के पारंपरिक तरीके रहे हैं रोज आधे घंटे प्राणायाम फेफड़े की क्षमता को कई गुना बढ़ा देते हैं ।इसके अलावा भुजंगासन ताड़ासन आदि इस क्षमता को बढ़ाने के लिए जरूरी माने गए हैं ।


 आयुर्वेद में ही इस बात का प्रावधान है कि योगिक क्रिया जैसे शंख प्रक्षालन, कुंजल क्रिया जिसे वमन क्रिया भी कहते हैं इसके द्वारा कफ को घटाया जा सकता है । इन क्रियाओं से शरीर का अम्ल भी घटता है ।  यह बात विज्ञान भी मानता है कि सूक्ष्म जीव जैसे बैक्टीरिया, फंगस, वायरस हर जगह मौजूद है इन जीवों की संख्या जब ज्यादा होती है तो बीमारी का कारण बनते हैं । होते यह हर जगह हैं  इनकी संख्या नियंत्रित करना जरूरी होता है जब ये ज्यादा होते हैं तो शरीर पर हावी हो जाते हैं । जिस तरह एक दो चींटी घायल सांप का कुछ नही बिगाड़ पातीं लेकिन सैकड़ों की संख्या में वो उसे मार डालती हैं इसी तरह माइक्रो आर्गेनिज्म की कम संख्या होने पर आपका शरीर स्वयं उससे लड़ लेता है । सदियों से कफ को नियंत्रित करने के लिए लोग पान लौंग और इलायची जैसी चीजें खाते रहें हैं। कफ से बचने के लिए प्रसिद्ध वैद्य डॉक्टर एम आर शर्मा  दावे के साथ पान का सादा पत्ता रोज खाने की सलाह दे रहे हैं । अब यह सोचिए कि जब एंटीबायोटिक नहीं थी तब कफ और जुखाम की समस्या से हमारे पूर्वज इन्हीं छोटे-छोटे उपाय से अपनी सुरक्षा करते थे। ये उपाय आज भी कारगर है अब समस्या यह है कि इन्हें प्रमाणित कौन करे ? बगैर प्रमाण के आप मानेंगे भी नहीं । आप मानते तब हैं जब हल्दी का पेटेंट कोई देश करा लेता है  । आप मानते तब हैं जब नीम का पेटेंट कोई करा लेता है। मेरे एक मित्र हैं डॉक्टर उदय पांडे जो हरिद्वार में रहते हैं मैंने उनसे पूछा कि क्या आप लोग पैंडेमिक के मरीज ठीक कर ले रहे हैं तो उनका जवाब था जी भैया हम लोग अब तक शत प्रतिशत मरीज ठीक कर चुके हैं। लेकिन एलोपैथी के सामने हमारी सुनता कौन है ? कहने का मतलब आयुर्वेद से मरीज ठीक तो हो ही रहे हैं लेकिन हमारा भरोसा कब कायम होगा ? पारंपरिक ज्ञान जिनको है भी वह भी बोलने से डरते हैं कि कहीं एलोपैथ वाले प्रमाण न मांग ले । ज्यादा बोलोगे तो नीम हकीम ठहरा दिए जाओगे । 


  आयुर्वेद में एक चिकित्सा पद्धति बहुत लोकप्रिय है जिसे क्षार चिकित्सा पद्धति कहते हैं यह क्षार चिकित्सा पद्धति इस सिद्धांत पर आधारित है कि शरीर में अम्ल बनता रहता है अम्ल के ज्यादा बनने से कई तरह के रोग होते हैं जैसे कब्ज , गैस, रक्तचाप, लिवर और किडनी के रोग ।  अतः शरीर को क्षारीय रखा जाए जिससे कई बीमारी अपने आप शरीर से दूर रहती हैं । शरीर को क्षारीय रखने के लिए फल इत्यादि खाने की सलाह दी जाती है देहरादून के प्राकृतिक चिकित्सक बीपी पांडेय कहते हैं कि जहां फल की उपलब्धता न हो वहां सहजन यानि मुनगा, नीम, पपीते, अमरूद , बेल आदि के पत्ते खाए जा सकते हैं । त्रिफला भी कारगर है । चूने के उपयोग की सलाह भी दी जाती है अक्सर लोग पान में चूना खाते हैं। फिटकरी का उपयोग घर घर इसीलिए होता था ।


 विज्ञान भी इस बात को प्रमाणित करता है कि तेल और घी में कोई भी सूक्ष्म जीव बहुत देर जिंदा नहीं रह सकता इसलिए गाय का घी सूंघने की सलाह आयुर्वेद सदियों से देता रहा है लेकिन अब इसको प्रमाणित कौन करे कि गाय का घी क्या फायदा करता है । यज्ञोपैथी यानि हवन से जीवाणु मरते हैं  ये बात सिद्ध हो चुकी है लेकिन अब इसको हिम्मत करके बोले कौन ? भाप थेरेपी प्राकृतिक चिकित्सा का ही हिस्सा है जिसे एलोपैथी वाले भी उतना ही स्वीकार करते हैं जितना इसे आयुर्वेद ने अपनाया है ।


  कुल मिलाकर कहने का आशय यह है कि भारतीय पारंपरिक ज्ञान तब भी उपयोगी था, आज भी उपयोगी है । कम से कम अगर आप स्वस्थ हैं तो स्वस्थ बने रहिए ये भी इस समय एक बहुत बड़ा योगदान होगा । स्वस्थ रहने का तरीका अपने पूर्वजों से सीख लीजिए आयुर्वेद और योग को जीवन पद्धति जितनी जल्दी बना लेंगे उतने ही फायदे में रहेंगे । क्योंकि फिलहाल तो एंटीबायोटिक के होश उड़े हुए हैं । वो ऑक्सीजन तलाश रही है । 


-ललित


(सत्यमेव जयते)

Saturday, February 13, 2021

नेवता हंकारी -

 नेवता हंकारी -

"मिसिर दादा तोहार नेवता है" । नाई ने आवाज लगाई ।
कहां ? मिसिर दादा ने पूछा।
हाजीपुर पराग पाड़े के भागवत बैठी है ।
अच्छा अच्छा । अरे लल्ला घर से नेवतौनी लै आओ ।
नेवतऊनी लेकर नाई अगले घर में निमंत्रण देने चला गया । अवध क्षेत्र में निमंत्रण को नेवता संबोधन के साथ जाना जाता है । निमंत्रण भी जेंवार के सभी लोगों को भेजने की परम्परा है । जेंवार उस इलाके को कहते हैं जिनके साथ खान पान का सम्बन्ध होता है इसका दायरा प्रायः दस किलोमीटर के आस पास हुआ करता था । अस्सी के दशक के नेवता खाने वालों के अनुभव कुछ अलग ही होते थे । क्या बड़े क्या बुजुर्ग सभी को कुर्ता बनियान निकाल के भोजन की पंगत में बैठना पड़ता था यहां तक कि घनघोर जाड़े में भी उपरि वस्त्र के साथ कोई भी पंगत में नहीं घुस सकता था । पंगत उठने के पहले गांव देश में क्या हो रहा क्या होना चाहिए इसकी चर्चा के लिए पर्याप्त समय होता था । एक दूसरे के गांव का कुशल क्षेम वहीं पूछा और पता किया जाता था । रिश्ते नाते भी इन्हीं आयोजनों और बैठकों में तलाश किए जाते थे ।
जब पंगत यानि पंक्ति या पांत बैठ जाती थी तो किसी नए आदमी को उनके उठने तक इंतजार करना पड़ता था और पंगत तभी उठती थी जब समूह में सभी भोजन कर तृप्त हो जाते ।
'पूड़ी भाई पूड़ी ' परोसने वाले खिलाने में चूक नहीं करते थे । कोई सूखी सब्जी जैसे कद्दू या घुईया आदि बनवाता था तो कोई सूखी के साथ रसेदार सब्जी जैसे कटहल या परवल आदि बनवाता था । सक्षम लोग दोनों की व्यवस्था करते थे । गलका एक विशेष तरह का व्यंजन था जो अचार की तरह चटखारे के लिए अनिवार्य रूप से होता था । खाने के साथ साथ बूंदी या गोरस और शक्कर का चलन था । गोरस यानि मठठा या छाछ आस पास के गांव से लोग उसके घर फ्री में सहयोग की भावना से पहुंचा जाते थे । खाने वाले भी मोछा बोर धकेलते जाते थे। गोरस और बुरा शक्कर पूरे खाने को आसानी से पचा देती थी फिर चाहे गाड़ी ओवरलोड ही क्यों न हो गई हो। और हां एक राज की बात ये भी होती थी कि कितनी भी जनता भंडारे में अा जाय गोरस कभी कम नहीं पड़ता था आखिर तक आते आते एक बाल्टी असली मठ्ठे में पांच बाल्टी पानी भी मिलाना पड़ जाय तो भी लोग बुरा नहीं मानते थे । सरयू किनारे की छोटी पूड़ी से लेकर गोमती किनारे की अंगौछा छाप पूड़ी को पचाने में
गोरस की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका होती थी ।
नेवता खाने के बाद सबको सबूत कपड़े जब मिल जाते थे तो दक्षिणा और पान की बारी आती थी पहले ये गांव वार किसी मुखिया को दी जाती थी जो उस गांव के सभी निमंत्रित को बांटता था बाद में सुविधा के लिए खाने के आखिरी दौर में पान और दक्षिणा पत्तल पर ही दे दी जाने लगी ।
गौहन्ना गांव और आस पास के इलाके में दो तरह के निमंत्रण और भी प्रचलित थे जिन्हें चुलिहा नेवार और लंगोट बन्द नेवता कहा जाता था । चुलिहा नेवार नेवता में घर के सभी लोगो चाहे वो पुरुष हो या स्त्री , बुजुर्ग हो या बच्चे सब का निमंत्रण रहता था यानि उस दिन चूल्हा नहीं जलाना बस आयोजक के घर धमकना और जम के खाना होता था । वहीं लंगोट बन्द नेवता में घर के पुरुष वर्ग को ही जाना होता था । बताते हैं कि पहले के जमाने में भोजन की उच्च तम शुद्धता बनाने के लिए हल्दी और नमक भोजन बनाते समय न डालकर अलग से पत्तल पर परोसा जाता था । नमक को राम रस कहते थे और नमक का बड़ा सम्मान था मजाल था कि नमक जमीन पर गिर जाए । बड़ी हिदायते नमक को लेकर थीं कि अगर जमीन पर गिर जाएगा तो आंख की बरौनी से उठाना पड़ेगा । ये डर ऐसा था कि नमक ही रसोई का राजा बन गया ।
एक बार मिसिर दादा के साथ उनका हमराह साहब दीन भी भंडारे में बैठा । परोसने वाले में नमक यानि राम रस वाले ने चिल्ला कर पूछना शुरू किया
रामरस भाई रामरस
साहब दीन बोले दे दो
उसने थोड़ा सा नमक पत्तल में रख दिया । साहब दीन को गुस्सा अा गई ये क्या थोड़ा ही रखा । परसने वाला ताड़ गया कि अजनबी है पहली बार पंगत में बैठा है बस उसने ज्यादा रख दिया।
साहबदीन खुशी में पूड़ी का पहला टुकड़ा रामरस के साथ खा बैठे और फिर उसके बाद उनने किसी भी भंडारे में रामरस नहीं मांगा ।
पूड़ी कद्दू का संयोग बहुधा हर गांव में प्रचलित था बाद में एनडी यूनिवर्सिटी में पढ़ते समय प्रोफेसर एसबी सिंह ने जो रहस्योद्घाटन किया उसे सुनकर आंचलिक विज्ञान के सामने नत मस्तक होना पड़ा । बकौल प्रोफेसर साहब पूड़ी में वसा होता है और कद्दू में विटामिन ए । विटामिन ए वसा में घुलन शील है इसलिए दोनों की जोड़ी फेमस है । कद्दू पूड़ी खाइए कभी अपच नहीं होगा ।
इन आयोजनों प्रयोजनों में जिसके घर भंडारा होता था उस को पूरा गांव ,समाज मदद करता था । कोई बरतन उपलब्ध करवाता था तो कोई हलवाई का काम करता था । मिल जुल कर बड़े से बड़ा भंडारा जिसमें हजारों लोग खाते थे आसानी से निपटा लिया जाता था । बड़े परोजनो यानि प्रयोजनों में कमान प्रायः गांव के पुरुष समाज के पास ही होती थी । एक कि इज्जत पूरे गांव की इज्जत होती थी । इसलिए गांव के लोग सबसे आखिरी में भोजन करते थे जब दूर दराज के लोग छक कर चले जाते थे ।
आज के दौर में सामूहिकता के इस सामाजिक ताने बाने की परम्परा धीरे धीरे कैटरर के हाथ में चली गई । पत्तल दोने बनाने वाले बन मानुष बेरोजगार हो गए । कुल्हड़ बीते जमाने की बातें हों गईं उनकी जगह प्लास्टिक के गिलास ने लेे ली । कुम्हार का चाक आहिस्ता आहिस्ता धीमा होता गया और उनको भी रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया । पुराने लोग यह भी कहते मिल जाते हैं कि न अब उस तरह नेवता खाने वाले रहे न खिलाने वाले । बफे सिस्टम जिन ने हज़म किया वो आज भी खड़े होकर खाना खा ले रहे हैं । बस वो महज औपचारिकता भर है रिश्तों और भाई चारे की गरमाहट अब ढूंढने से भी नहीं मिलती ।

छपरा

 छपरा

छपरा भले ही बिहार का एक नामी जिला हो लेकिन गौहन्ना में छपरा का मतलब घास फूस के छप्पर से ही रहा है जिसे सरपत और मूंज से बनाया जाता था । साथ में बीच बीच में तिलेठी और झखरा भी घुसाया जाता था तब जा कर छप्पर मजबूत बनता था ।
अब ये शब्दावलियां गांव गिरांव के ही शोध का परिणाम थीं किसी शब्द कोष में मिलना मुश्किल है अतः समझने के लिए बताना जरूरी है झखरा अरहर के सूखे पौधे को कहते हैं तो तिलेठी सरसों या राई का सूखा पौधा होता था । मेड़ और खाईं पर मिलने वाला मुंजा या सरपत गन्ने के परिवार का छोटा भाई कह सकते हैं जिसके ऊपर पानी नहीं रुकता था । इस तरह छप्पर मजबूत बन जाता था ।
छप्पर उठाने के लिए आवाज लगानी पड़ती थी । जहां ज्यादा लोग एक साथ खड़े मिलते तो लोग मुहावरा बोलते कि
"का छपरा उठावै जात हौ" ?
छपरा सामूहिक सहयोग और मेलजोल की भावना का आसमान हुआ करता था ।
गांव में ज्यादातर घर मिट्टी के ही बने होते थे जिनकी दीवारें मोटी मोटी हुआ करती थीं । रद्दे पर रददे रख कर दीवार छत की ऊंचाई तक लाई जाती थी । दीवार के लिए चिकनी मिट्टी जिस तालाब की अच्छी होती थी वहीं के लिए मारा मारी रहती थी बेतला ताल से लेकर नकसरा डोभी और झिलिया के ताल काम में आते थे । इसी बहाने हर साल ये तालाब बिना मनरेगा स्कीम खुदते रहते थे और गांव की वाटर बॉडी रिचार्ज होती रहती थी । पक्के घरों के बनने से तालाब भी उथले होते चले गए और जल स्तर रसातल में चला गया । खपड़े और नरिया के घर संभ्रांत लोग ही बनवा पाते थे ।
छत ढालने के लिए मूठ और करी का प्रयोग होता था जिस पर मिट्टी की पटाई होती थी । किसी का घर बनाने में कोई सहयोग कर देता था तो दूसरे को बदले में श्रमदान जिसे हूंण कहते थे देना पड़ता था ।
छपरा को हर जगह छपरा नहीं कहा जा सकता था उसके नाम अलग अलग थे जब वो शहन दरवाजे पर होता था तो ओसारा कहलाता था , बाहर मड़हा कहलाता था और छत के ऊपर पूरी तरह छत को ढकता था तो रावटी कहा जाता था जिसमें बीज को कई मटके व मटकी में रखा जाता था एक प्रकार से ये तब का जीन बैंक होता था ।
मड़हा दोनों तरफ ढाल दार होता था उसके चारों तरफ रोकने के लिए लकड़ी की थूनी लगाई जाती थी जो Y आकार की होती थी मध्य भाग बड़ेर को बड़ी बड़ी लकड़ियों यानि थमरा पर टिकाया जाता था ।
छप्पर का छोटा रूप परछती कहलाता था और छप्पर के जिस हिस्से से बरसात का पानी जमीन पर गिरता था उसे बरौनी कहते थे ठीक आंख की बरौनी की तरह ।
इन छप्परों में खेती किसानी के बीज से लेकर सिकहर पर रोटी और खाना भी टंगा होता था । अक्सर छप्परों पर तोरी, लौकी, कद्दू , सेम के पौधे मिल ही जाते थे । किचन गार्डन का यह फार्मूला गांव की हर घर में दादी आजी को पता होता था । गांव खुद में ही स्वावलंबी होते थे । जब इनमें फल आते थे तो किसी छोटे बच्चे को छप्पर पर चढ़ा कर फल तुड़वाए जाते थे जिससे छप्पर को नुक्सान न पहुंचे और सब्जी भी मिल जाय ।
छप्पर किसानों के खेत में रखवाली के लिए जब रखा जाता था तो इस मचान को अटाना के नाम से जाना जाता था । ये अटाना जमीन से पांच छह फीट की ऊंचाई पर होता था जिससे पूरा खेत देखा जा सके । उस अटाना पर चढ़ने के लिए थूनी में ही खड्डे बना दिए जाते थे । ये अटाना कुछ समय के लिए हवा महल की अनुभूति जरूर करा दिया करता था ।
जानवरों के रहने के लिए बनाए जाने वाले स्थान को सरिया कहा जाता था जिसका छपरा ज्यादातर एक तरफ ढाल वाला होता था । छप्पर को कस कर बांधने के लिए अरहर की कईनी का प्रयोग होता था । बांस के डंडे छप्पर की मजबूती के लिए बीच बीच में जरूर लगाएं जाते थे । प्रायः ये डंडे डेढ़ से दो फीट की समान दूरी पर दोनों तरफ रहते थे ।
छप्पर का गर्मियों में अलग ही आनंद होता था तापमान कितना भी बढ़ जाय लेकिन बिना एसी के अंदर का मौसम मजेदार रहता था । जाड़े के दिनों में मड़हा के चारों ओर टटिया लगानी पड़ती थी जो जाड़ों से सुरक्षा देती थी। अरहर की टट्टी और गुजराती ताला के कहावत वाली ये टटिया ठंडी हवा से बचाव करती थी ।
जब कभी गांव में आग लग जाती थी तो मंजर खतरनाक होता था कभी कभी एक दो घर के बाद आग बुझा ली जाती थी तो कभी कभी गांव के गांव साफ हो जाते थे । फायर ब्रिगेड होते जरूर थे लेकिन जब तक सूचना जाती थी और वो दो चार घंटे बाद आते थे तब तक सर्व नाश हो चुका होता था । लेखपाल या तहसीलदार मातम पुर्सी के लिए अा जाय तो एहसान जैसा होता था । आज की तरह न तो जनता जागरूक थी न ही उसे इन सब चीजों से बहुत उम्मीद थी। गौहन्ना गांव में बिजली लगने के बाद सबसे ज्यादा घर इसलिए जल गए थे कि चलती बिजली लाइन में पानी डालने से करंट लग रहा था । दिया और तपता यानि अलाव और कभी कभी हुक्का और बीड़ी पीने वालों की असावधानी छप्पर के छप्पर निपटा जाती थी ।
अब गौहन्ना में भी पक्के घरों का चलन हो गया है । हां आज भी छप्पर मौजूद हैं पर छपरा के छवैया यानि आर्किटेक्ट अब ख़तम होते जा रहे हैं । कुछेक आर्किटेक्ट बड़े बड़े होटलों ने बुला लिए हैं जहां छपरा में लोग बैठ कर लग्ज़री महसूस करते हैं । ग्रामीण जीवन के इस मौलिक आर्किटेक्ट को आज जब होटल में देखता हूं तो सोचता हूं कि जो ग्रामीण जीवन की मज़बूरी में विकसित कला कृति अब कमाई का जरिया भी बन गई है