Saturday, February 13, 2021

अंगना दलान-

 अंगना दलान-

'झिलमिल सितारों का आंगन होगा
रिमझिम बरसता सावन होगा '
सितारों का आंगन गौहन्ना के गांव में भी हुआ करता था । जहां कुछ पल के लिए पूरा घर सुस्ताता था । गौरैया दाना चुगने आती थी और तुलसी का पौधा सीधे आसमान से आती किरणों से नहाता था । गांव गांव आंगन बनाने की परंपरा सदियों से रही है आज भले ही घर पक्के हो गए हों लेकिन आंगन नहीं तो घर की रौनक नहीं हां शहरों ने आंगन अलबत्ता लगभग लगभग खो दिए हैं ।
गांव में पूरा घर केवल घर नहीं था उसके कई भाग और अनुभाग हुआ करते थे । घर के बाहर का हिस्सा दुआर मुहार कहलाता था । किसी के घर के संस्कार उसके दुआर मुहार की रौनक और साफ सफाई से समझे जा सकते थे । घर में घुसने का पहला दरवाजा शहन दरवाजा कहलाता था । चौखट दरवाजे का अनिवार्य हिस्सा हुआ करता था । चौखट पर मत्था टेकने की कहावत तो सुनी ही होगी । चौखट और दरवाजे से झुक कर प्रवेश की परम्परा घर को मन्दिर की संज्ञा तक स्थापित करते थे ।
घर का सम्मान सबको करना होता था । दरवाजे पर गोबर और गेरू से लिपाई घर घर में होती थी । कुंडा, सांकल या जंजीर आदि दरवाजे के सुरक्षा सरदार होते थे ।बहुत कम ऐसा होता था कि बाहर ताला लगाना पड़े क्योंकि संयुक्त परिवार इतना बड़ा होता था कि उसका कोई न कोई सदस्य घर में रहता ही था ।
चौखट से आगे कदम रखते ही जो कमरा मिलता था उसे दालान कहते थे । प्रायः उसी के बगल एक कमरा चौपार का होता था जहां पुरुष वर्ग सामूहिक चर्चा के लिए इकठ्ठा होते थे । मेहमानों की आवभगत भी उसी कमरे में होती थी ।
दालान में ही अनाज की कोठरी और डेहरी भी हुआ करती थी जिसमे साल भर के अनाज की व्यवस्था पूरी तरह दुरुस्त रहती थी । डेहरी मिट्टी की बनी होती थी ऊपर से भरते थे नीचे के छेद से निकासी की जाती थी।
यही कहीं आस पास एक कमरा बखार का होता था जहां खेत से आया अनाज खासकर गेहूं चना मटर बोरे में भरकर भूसे के अंदर रख दिया जाता था । इस तरह ये अनाज कम ऑक्सीजन के केंद्र में कीड़े मकोड़े से बहुत दिनों तक सुरक्षित रहता था।
चौखट दालान पार करने के बाद घर का सबसे महत्वपूर्ण भाग आंगन होता था जिसे गौहन्ना में अंगना कहते थे।
नरायन दादा सबेरे सबेरे गाते थे
'बहारो गोरी अंगना
होय गवा सबेर ..'
अंगना के तीन तरफ तीन कोठरियों के अलग अलग नाम थे
एक तरफ रसोई होती थी और ज्यादातर उस में ही कुल देवता स्थापित होते थे हर घर का कुल देवता विशिष्ट होता था जिसे आज भी देवतन के नाम से जानते हैं। शादी विवाह, मुंडन , जनेऊ, किसी भी संस्कार या प्रयोजन की सफलता कुल देवता की प्रसन्नता पर निर्भर होती है । रसोई के पकवान , नई फसल आदि सबसे पहले वहीं अर्पित की जाती है । विवाह के समय कोहबर इसी कमरे में बनता है । कोहबर चित्रकला अवध की बेहतरीन लोक कला है जिसे अगर संरक्षण न मिला तो लुप्त हो जाएगी । मधुबनी पेंटिंग से ये कला रत्ती भर कम नहीं है।
रसोई में हर किसी को पैर धुल कर नंगे पैर ही जाना होता था । बिना नहाए कोई खाना नहीं बना सकता था । चूल्हा चौका घर के पवित्र स्थान के रूप में स्थापित होता था ।
जिस संस्कृति में अन्न को ब्रह्म का दर्जा मिला हो वहां चूल्हा चौंका यज्ञ स्थल तो होगा ही । कहते हैं कि दुनिया की सबसे पहली प्रयोग शालाएं रसोई घर ही रहीं होंगी और दुनिया की सबसे पहली वैज्ञानिक महिलाएं ही रही होंगी । पोषण और स्वास्थ्य के जितने प्रयोग यहां हुए वे पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहे।
नई नवेली दुल्हन की कोठरी अलग ही होती थी जिसमे उसका अपना राज्य होता था । पूरब की कोठरी, पछू की कोठरी , दखिन की कोठरी आदि नामों से इन्हे जाना जाता था । दूध गरम करने की जगह को दुध गड़ा कहते थे । अनाज पीसने के लिए बड़े बड़े पत्थर के जांत होते थे । सुबह सुबह उठकर महिलाओं को ये जांत या छोटी चकिया पकड़नी पड़ती थी तब जाकर घर में रोटी की व्यवस्था होती थी। अलग से योग या कसरत करने के लिए कहीं जाना नहीं पड़ता था । आंगन के सिल बट्टे में पिसे मसाले गारंटी के साथ शुद्ध हुआ करते थे। । धान कूटने के लिए पहरुए और ओखली कोने में मौजूद रहते थे ।
पूजा का घर देवतन का स्थान ही हुआ करता था अब तो अलग से भी पूजा का कमरा बनने लगा । किसी किसी घर में दुमहला भी होता था लेकिन होता मिट्टी का ही था । मिट्टी के घर में छत के ऊपर अटारी होती थी ।ये गाना तो सुना ही होगा
'आया आया अटरिया पे कोई चोर'
खैर अब अटारी होती नहीं सो चोर का क्या करना ।
फिर भी उस दौर में दिया यानि दीपक या चिराग रखने के लिए ताखे या डूठी हुआ करती थी । कपड़े टांगने के लिए बांस की अरगनी या लकड़ी की खूंटी पर्याप्त हुआ करती थी । कूड़े , मटके के अनाज छत के ऊपर बनी रावटी में रखे जाते थे । तहखाने या भुइं नशा बड़े बड़े घरों में ही होते थे ।
अवध क्षेत्र के ये घर घर से ज्यादा मन्दिर थे । तब के घर मिट्टी के होने के बावजूद एक अनोखी दुनिया थे जिसमें संपूर्णता थी और अपने पराए सब के लिए दिल खोल के जगह ही जगह थी । चाहे दुआर मुहार हो या अंगना दलान सब की अपनी पहचान और गरिमा थी ।

फरा -

 फरा :

(ललित मिश्र के ब्लॉग झल्लर मल्लर दुनिया से )
कुछ नया नाम लग रहा है न? लेकिन गौहन्ना में ये नाम न जाने कब से चल रहा होगा । अवध क्षेत्र में इस व्यंजन को फ़रा नाम से ही जानते हैं । आपकी सुविधा के लिए बता दें कि इसकी तुलना आप मोमोज से कर सकते हैं । लेकिन दोनों में थोड़ा अंतर भी जानना जरूरी होगा नहीं तो इस अवधी व्यंजन के आंनद को महसूस नहीं कर पाएंगे ।
जिस तरह हर क्षेत्र का कुछ खास व्यंजन होता है उसी तरह अवध क्षेत्र का फरा बहुत खास होता है । इसे चावल के आटे से बनाते हैं और चावल के आटे की छोटी छोटी पतली रोटियों के ऊपर उड़द की पिसी भीगी हुई मसाले वाली दाल इसमें भर दी जाती है । किसी छोटी कागज की नाव की तरह इसका आकार होता है लेकिन इसका मुंह खुला रहता है । फरा को बटुली या पतीली के ऊपर भाप में लगभग बीस से पच्चीस मिनट पकाना पड़ता है ।
मोमोज और फरा में मूल अंतर मुंह के खुले और बन्द होने का होता है। मोमोज पूरी तरह बन्द होता है जबकि फरा का मुंह खुला रहता है और इसका अंदर का सामान बिल्कुल नायाब होता है ।
कहते हैं कि किसी पर्यटक स्थल पर जब लोग जाते है तो वहां के स्थानीय व्यंजन ढूंढ़ते हैं । लेकिन अवध के ढाबे और होटल अवध के कम पंजाब के नकल में ज्यादा फंस गए, इसलिए वहां आप फरा नहीं ढूंढ़ पाएंगे । करते भी क्या ट्रक का हाईवे, ड्राइवर, खलासी सब पंजाब के तो खाना भी उसी तरह का चल निकला किसी का ध्यान इस बात पर गया ही नहीं कि अयोध्या भ्रमण पर आने वाले पाहुन को लोकल डिश की भी तलाश होगी ठीक उसी तरह जिस तरह आपको दक्षिण भारत में सांभर- डोसा की तलाश रहती है । ठीक उसी तरह जब आप गुजरात में ढोकला और खांख्रा ढूंढ़ते हैं । ठीक उसी तरह जिस तरह आप पंजाब में मक्के की रोटी और सरसों का साग ढूंढ़ते हैं जो आपको वहां के हर ढाबे पर मिल जाता है ।
गौहन्ना और आस पास के क्षेत्र में फरा बनाने के लिए छलनी या जालीदार सिकहुला का प्रयोग किया जाता है । इसको बनाने का चलन कार्तिक मास से फाल्गुन तक ज्यादा होता है । तैयार फरे को घी के साथ खाने का आंनद ही कुछ और होता है । आम या इमली की मीठी चटनी के साथ इसे परोसा जाता है । इसको गरमा गरम खाने का मजा ही कुछ और है लेकिन अगर ये बच जाए तो घी और जीरे के छौंक के साथ इसे नए अंदाज में आप खा सकते हैं । इस डिश के साथ गांव में गन्ने के रस से चावल का रसियाव भी खाया जाता है । जो किसी खीर की तरह बनता है । गांव के इन व्यंजनों में जन्मों जन्मों की तृप्ति एक साथ मिल जाती है ।
फरा के सीजन में ही दलभरी पूड़ी का चलन भी रहता है । चने की दाल को पीस कर रोटी के अंदर भर कर बनाने की कला गांव - गांव में प्रचलित है । ये दलभरी पूड़ी तवे पर बड़े इत्मीनान से सरसों के तेल में सेकीं जाती है और मक्खन , गुड या अचार खासकर भरवा मिर्चे के साथ परोसी जाती है ।जिस के मुंह ये एक बार लग गई तो लग गई फिर आदमी आलू का पराठा खाना भूल जाता है ।
इस तरह के न जाने कितने व्यंजन अवध की स्थानीय ग्रामीण संस्कृति में घर - घर बनाए जाते हैं । इनमे से कुछ की चर्चा करते रहेंगे । फिलहाल जब तक होटल और ढाबे में ये डिश नहीं बनने लगती तब तक जब भी अवध क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में जाएं तो इन व्यंजनों को खाना न भूलें ।संकोच मत करिएगा कि कोई खिलाएगा नहीं । जम के लोग खिलाएंगे , खुश होकर खिलाएंगे ।
(गौहन्ना डॉट कॉम पुस्तक से साभार )

संहिड़ा-

 संहिड़ा-

अलग अलग क्षेत्रों में इसके नाम अलग अलग हैं लेकिन इसका स्वाद जब बोलता है तो सर चढ़कर बोलता है । एक बार जिसने खा लिया तो ता उम्र इसको ढूंढ़ता फिरता है । हां ये हर जगह नहीं बनता इसीलिए तो ढूंढ़ना ही पड़ता है । गौहन्ना में इसे संहिड़ा कहते हैं अवध क्षेत्र में कहीं कहीं इसे पतोड़ भी कहते हैं क्योंकि ये घुइया यानि अरवी के पत्तों से बनाया जाता है ।
घुइया के नरम पत्तों को एक के ऊपर एक किसी सीरीज की तरह जमाया जाता है इन पत्तों के बीच में रात भर की भीगी हुई उड़द की सफेद दाल का पेस्ट लगा कर उन्हें चिपकाया जाता है । इस दाल के पेस्ट में नमक , मसाला, हींग आदि डाल कर स्वादिष्ट बना दिया जाता है । इन पत्तों को अब रोल कर चार चार अंगुल दूर से काट दिया जाता है । अब ये किसी गोल परतदार प्याज की तरह हो जाता है । ऊपर से भी उड़द की दाल का वहीं पेस्ट लगाकर राई या सरसों के तेल में तल लिया जाता है । तलने के बाद आखिरी प्रक्रिया में खाली कड़ाही में हल्की आंच पर भाप से पकाया जाता है ये भाप उसी तले हुए संहिड़ा की ही होती है अलग से पानी नहीं डालना होता ।
सोंधा पन लिए हुए संहिड़ा को ताजा ताजा इमली या आम की चटनी के साथ खाने का मजा ही कुछ और है ।
इस व्यंजन को कई दिनों तक रखा जा सकता है बासी संहिड़ा को तवे पर गरम कर खाने का भी रिवाज है ।
अवध के इन व्यंजनों में संहिड़ा के साथ बनने वाले रिकवछ को भी उड़द की भीगी दाल से बनाते हैं । दाल की अंगूठे के आकार की पिठी को तेल में तल कर उड़द की ही भुनी और छौंकी कढ़ी में डाल दिया जाता है ।
बेसन के आटे से बनने वाली फुलौरी का नाम तो सुना ही होगा । पकौड़ी से मिलते जुलते इस व्यंजन में केवल बेसन के आटे को राई या सरसों के तेल में मात्र नमक जीरा मिला कर तल लिया जाता है फिर इसे कढ़ी ने डालकर या पना बना कर खाया जाता है ।
पना चावल के आटे को भूनकर गुड़ का रस या घोल मिलाकर धीमी आंच पर घोटकर बनाया जाता है जब घोल गाढ़ा हो जाता है तो इसमें नमक व इमली की या आम की खटाई मिला दी जाती है । पना में रात भर फुलौरी को डाल कर और भी स्वादिष्ट बना दिया जाता है । पना का ये खट्टा मीठा स्वाद आपको किसी कुकरी बुक या वेबसाइट पर शायद ही नसीब हो किन्तु अवध के गांव में ये जरूर मिलेगा । फुलौरी की लोकप्रियता इतनी थी कि इस पर एक लोकगीत बहुत दिनों तक लोगों की जुबान पर चढ़ा रहा -
'कैसे बनी हो रामा
कैसे बनी ?
फुलौरी बिना चटनी
कैसे बनी ?'
व्यंजन जब ज़बान से आगे आनंद की अभिव्यक्ति बन जाएं तो ये समझ लेना चाहिए कि वह लोक सुख का आधार भी है । जिसे गौहन्ना वाले आज भी खाकर अपने हर ग़म को भूल जाते हैं ।
(गौहन्ना डॉट कॉम पुस्तक का अंश)

ठोकवा -

 ठोकवा -

पूड़ी , पराठे , कचौड़ी , छोले तो उत्तर भारत में हर जगह मिल जाते हैं लेकिन कुछ व्यंजन तो अवध की शान हैं । ठोकवा भी उन्हीं में से एक है जो सूखे महुवे के फूल को भिगो कर और कूंच कर यानि लुगदी बना कर पराठे की तरह सेंक कर या तल कर बनाया जाता है । ये कूंचने वाला शब्द गौहन्ना और आसपास जिस अंदाज से बोला जाता है उसी अंदाज से उस शब्द का अर्थ समझना पड़ता है । अगर गुस्से से बोला गया तो मतलब पिटने से होता है अगर प्यार से बोला गया तो मतलब सचेत करने से भी होता है । ठोकवा ठोक ठोक के बनता है इसलिए नाम ही ठोकवा पड़ गया । महुवे के पेड़ गौहन्ना व पूरे अवध क्षेत्र में जगह जगह मिलते हैं । महुवे के बारे में एक कहावत मशहूर है
गुड़ , बरगद महुआ कै गादा
याहू की ताई दतुइन करी दादा
मतलब इनको खाने के लिए दातून यानि ब्रश करने की जरूरत नहीं बस मिले तो खा जाओ ।
ताजे महुआ के फूलों से रस निकाल कर गरम कर उसमें आटा मिला कर तवे पर चिल्ला और बरिया बनाने का रिवाज है । ठोकवा और बरिया महीनों तक खराब नहीं होता । वैसे कुछ लोग ठोकवा, बरिया और चिल्ला से आगे प्रयोग के माहिर भी गौहन्ना में थे । बाकी आप समझ गए होंगे ।
लंबे समय तक चलने वाले खाद्य पदार्थ उन जगहों पर ज्यादा प्रयोग कर के खोजे और बनाए गए जहां या तो यात्राएं लंबी करनी होती थीं या फिर खाद्य संरक्षण एक मज़बूरी रही हो । धार्मिक यात्राओं , रोजगार की तलाश में जाने वाले लोग एक एक महीने का खाद्य बांध कर चलते थे । जहां रात हुई वहीं इस तरह की चीजें खा कर सो गए सुबह फिर से सफ़र पर निकल लिए ।
इस तरह के सूखे राशन में सतुआ का महत्वपूर्ण योगदान रहा है सतुआ गोजई यानि जौ को चने के साथ पीस कर बनाया जाता है पीसने के पहले इसे भून लेते हैं । पूर्वांचल और बिहार का प्रसिद्ध बाटी चोखा जिसने भी खाया होगा उसे पता होगा की असली टेस्ट सतुआ से ही आता है । सतुआ सीधे पानी में घोलकर पेस्ट के रूप में चटनी या सिरके या फिर गुड़ के साथ खाया जाता है । सतुआ खाने का त्योहार भी होता है जिसे सतुआ संक्रांति कहते हैं ।
सूखे खाने की परंपरा में आटे की पंजीडी भी होती है जिसे अक्सर सत्य नारायण भगवान की कथा में बनाया जाता है । गेंहू के आटे को हल्का भूनकर गुड़ मिला कर पंजीड़ी बनाई जाती है । इसी तरह चावल के आटे को भूनकर गुड़ के शीरे में घोंटकर जो लड्डू बनाया जाता है उसे गौहन्ना में ढूंड़ी कहते हैं इसमें अगर तिल और सोंठ मिला दी जाय तो मज़ा दुगना हो जाता है । लाई की ढूंड़ी तो बच्चे बूढ़े सब बड़े मज़े से निपटा जाते हैं । गुलगुले गुड़ के घोल में गेहूं के आटे को फेट कर सरसों के तेल में तल कर बनाया जाता है । अपने लल्ला भैया को गुलगुला इतना पसंद था कि उनका बस चलता तो खाने की जगह गलामू यानि गुलगुले ही रोज बनते । लेकिन क्या करें दांतों ने मीठे की गवाही प्राइमरी स्कूल में भी देनी शुरू कर दी थी सो मास्टर साहब ने ज्यादा मीठा खाने से उन्हें रोक दिया था । इसी डर से उनके कुछ दांत सलामत बचे रहे ।
दाल और सब्जी के विकल्प के रूप में प्रचलित मेथौरी की बात ही अलग है । खबहा कोहड़ा यानि पेठे वाले कद्दू को घिस कर उड़द की पिसी दाल में मसाले के साथ मिला कर बनने वाली मेथौरी को कहीं कहीं कोंहड़ौंर या बड़ी के नाम से भी जानते हैं । सुनने में आया है कि आजकल अमेजन और कई नामी ऑनलाइन प्लेटफार्म पर भी ये बिक रही है । आने वाले समय में छोटा मोटा ऑनलाइन गृह उद्योग इन सबसे तो चलेगा ही । खाना ही ऐसा क्षेत्र है जहां मंदी की दाल नहीं गलती ।
(गौहन्ना डॉट कॉम पुस्तक का अंश)

सिखरन-

 सिखरन-

बात गन्ने और गांव की हो तो सिखरन का जिक्र आना स्वाभाविक है । अवध क्षेत्र में गन्ने के कोल्हू गांव गांव पाए जाते हैं । खेत में खड़े गन्ने को चूसने का जो मज़ा है वो दांत वाले ही जानते हैं । लेकिन सिखरन गन्ने के रस में दही मिला कर बनाया जाता है । जब गन्ने का सीजन ख़तम हो जाता है तो राब को घोल कर दही मिला कर सिखरन बनता है । दही की जगह मठ्ठा मिल जाय तो पूछना ही क्या ? कैसी भी गर्मी में चल कर कोई आया हो । एक लोटा सिखरन सारी थकान उतार देता है ।
गौहन्ना गांव में एक दो खेत गन्ने के हर किसान के पास होते थे । सरौती गन्ने की उस समय धूम हुआ करती थी बाद में उन्नत किस्म के गन्ने आने लगे थे । गांव में एक कोल्हू हुआ करता था जो मिसिर दादा के खलंगा में चलता था जिसे कोल्हार कहते थे । इस सीजन का इंतजार पूरे गांव को रहता था जब कोल्हू का चलना शुरू होता था । सहकारिता के सिद्धांत के तहत सबको अपने बैल बारी बारी से फांदी के हिसाब से कोल्हू में हांकने पड़ते थे। हांकने वाले को नांद भरने तक बैल हांकना होता था ।
गन्ने के रस को बड़े कड़ाह में उबाल कर गुड़ बनाया जाता था । कड़ाह के नीचे लकड़ी , सूखे पत्ते , फसल के अवशेष व खोई आदि झोंक कर लगातार आग जलाई जाती थी । एक निश्चित गाढ़ा पन आने पर मिट्टी के बड़े चाक में उसे निकाल कर ठंडा किया जाता था फिर पूरा ठंडा होने के पहले ही उसे गोल गोल भेेली बना कर रख लिया जाता था गुड़ बनाने वाले विशेषज्ञ बड़े सम्मान से देखे जाते थे सबको गुड़ बनाना नहीं आता था ।ये भेेली अगले साल तक घर की शान हुआ करती थी । रस को अगर थोड़ा पतला उतार लिया जाए तो राब बन जाती थी । गन्ने से बनने वाली शहद जैसा उत्पाद - राब को कुछ इस तरह भी समझा जा सकता है जिसे रोटी से खाने के साथ साथ घोल कर भी पिया जाता था ।
जिस जगह गुड़ बनता था यानि कोल्हार ग्रामीण सामाजिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र हुआ करता था जहां पूरे गांव मोहल्ले में क्या चल रहा है सबकी चर्चा होती थी ।जगने के लिए रात रात भर कहानियों और किस्सों का दौर चलता था । भूत प्रेत के किस्से भी रोमांच पैदा करते थे । गांव के बच्चे गुड़ और उससे भी ज्यादा छेंवटा की लालच में वहां जमे रहते थे । छेंवटा कड़े गुड़ का अवशेष होता था जो कड़ाह में तले में जम जाता था । कुछ आलू , गंजी प्रेमी भार की गरम आग में आलू ,गंजी यानि शकरकंदी भूजा करते थे । गुड़ बनाते समय निकलने वाली मेल को लदोई कहते थे । पहले तो भिंडी की जड़ डाल के उसे साफ किया जाता था बाद में खाने वाले सोडे का प्रयोग होने लगा ।इससे गुड़ लाल से थोड़ा गोरा होने लगा । लेकिन आयरन की मात्रा घटने लगी ।
सिखरन के साथ सबसे ज्यादा बढ़िया संयोग जिस व्यंजन का बनता था वो घुघुरी कहलाती थी जो ताजी मटर के दानों के साथ आलू को मिलाकर जीरे के छौंक के साथ बनाई जाती थी। सुबह का नाश्ता घुघरी और सिखरन ही होता था । गन्ने के सीजन में गांव का पूरा कूड़ा कबाड़ जल कर राख बन जाता था जो खेतों में वापस डाल दिया जाता था । गन्ने की खोई चूल्हे में बायो ईंधन के रूप में जलाई जाती थी ।
मिसिर दादा ने धीरे धीरे कोल्हू से हाथ खींच लिया क्योंकि तब तक इंजन और बिजली से चलने वाले क्रेशर अा गए थे गांव से बैल भी नदारद होने लगे थे उनकी जगह ट्रैक्टर ने लेे ली थी ।धीरे धीरे चीनी मिल गांव के पास ही खुल गई । रौजा गांव की चीनी मिल आने के बाद कोल्हू पूरी तरह बन्द हो गए । किसानों के गन्ने नकद के चक्कर में चीनी मिल जाने लगे । गन्ने का एरिया बढ़ने लगा और घरों से गुड़ गायब होकर चीनी बन के लौट आया साथ ही अपने साथ कुछ बीमारियों को भी साथ लाया । क्योंकि न तो चीनी में आयरन था न ही कैल्शियम सो इन सबकी आपूर्ति गांव में भी मेडिकल स्टोर से ही होने लगी है जो किसी ज़माने में फ्री में गुड़ और भेली से मिल जाता था ।
(गौहन्ना डॉट कॉम पुस्तक का अंश)

बरा -

 बरा -

उत्सवों के देश भारत में उल्लास के नए नए तौर तरीके और त्यौहार होते हैं । उत्सव और व्यंजन का हमेशा से चोली दामन का साथ रहा है । बरा उत्सवों का राजा रहा है । होली हो या ईद बरा अवध की शान रहा है । दक्षिण भारत में सांभर बड़ा तो अन्य जगह बड़ा या बरा नाम से इसे जाना जाता है । शादी विवाह, मुंडन, जनेऊ, हर संस्कार बरा के बिना अधूरा है । दही में पड़ जाय तो दही बड़ा भी बन जाता है । खट्टी या मीठी जिस तरह की चटनी के साथ खाना हो बरा तो बड़ा ही होता है । जीरा के बिना दही बड़ा अधूरा ही रहता है । उड़द की भीगी व पिसी हुई दाल से बड़ा सहित कई व्यंजन बनाए जाते हैं ।
गौहन्ना और आस पास के इलाके में अस्सी के दशक में शादियां तीन दिन की हुआ करती थीं। बताते है भगवान राम की बारात जनकपुर में महीनों रुकी थी तो अवध में तीन दिन भी न हो ये कैसे हो सकता है ? बारातियों को दूसरे दिन रसेदार कटहल की सब्जी मिलती थी और साथ में दही बड़ा भी मिलता था । अवध क्षेत्र की कटहल की रसेदार सब्जी जिसने खाई होगी उस का स्वाद वहीं जानता होगा । ढूंढे से भी वो स्वाद आजतक किसी होटल में नहीं मिला । इस तरह की शादियों में दही चूरा भी खूब चलता था । भगवान राम की शादी में जब दशरथ जी जनकपुर पहुंचे तो स्वागत में उपहार में दही चूरा भर भर के मिला था जिसे रास्ते भर बाराती खाते हुए आए थे।
दधि चिउरा उपहार अपारा
भरि भरि कांवरि चले कहारा ..
आज के दौर में तीन दिन की शादियां रात भर में निपट जाती हैं जो लगता है भविष्य में तीन घंटे की ही रह जाएंगी ।
गौहन्ना और आस पास के क्षेत्रों में गुड़िया और अनंता के त्योहार पर सिंवई भी बनती है । बगल के गांव बड़ा गांव में ईद पर सिंवई ही उत्सव की शान होती है । होली के मुख्य व्यंजन के रूप में गुझिया पूरे देश में प्रसिद्ध है । कहते है कि गुझिया अवध की ही खोज है । सोंठ से बनने वाले व्यंजन सोंठौरा बच्चे के जन्म के समय मां का अनिवार्य पौष्टिक आहार होता है । खिचड़ी के दिन उड़द की खिचड़ी जरूर बनती है । खिचड़ी के चार यार प्रसिद्ध हैं
खिचड़ी के चार यार
घी , पापड़,दही, अचार
और फिर थारिया यानि थाली भर भर खिचड़ी यारों के साथ स्वाद का खजाना बन जाती है । फिलहाल इन सब व्यंजनों में राजा साहब यानि बरा दही बड़े के रूप में आजकल शहरों में खूब बिक रहे हैं ।
(गौहन्ना डॉट कॉम पुस्तक का अंश)
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झुलनी -

 झुलनी -

गहने हर संस्कृति की पहचान रहे हैं । गहने लोक गीतों से लेकर आधुनिक गीतों में भी समाहित हैं । धातुओं के मूल्य के आधार पर समृद्ध संस्कृति का आकलन होता रहा है । हिन्दुस्तान को सीने की चिड़िया कहे जाने के पीछे एक राज यह भी था कि हर घर में सोने के आभूषण पहनने का रिवाज था । काली मिर्च के बदले सोना यूरोप, अरब हर जगह से आता था । सोने के चक्कर में आक्रमण कारियों के लिए आकर्षण का केंद्र भी हिन्दुस्तान ही रहा । उसमें भी अवध का क्षेत्र व गंगा जमुना का दोआब का आकर्षण ये था कि जिसने इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया उसने पूरे देश पर राज कर लिया ।
गौहन्ना में भी गहनों का चलन सदियों से रहा है कुछ तो खुदाई में भी मिलते रहे लेकिन जिनको मिले वो छुपा गए । फिर भी संस्कृति अनवरत चलती रहती है ।
स्त्रियों में गहने का चलन पैरों से लेकर सिर तक रहा है । कड़ा , छड़ा , पावजेब, लच्छा, पायल , बिछुआ ये सब पैरों में पहने जाते हैं । कहते हैं कमर के नीचे सोना नहीं पहनना चाहिए इसलिए ये सब आभूषण चांदी के है होते रहे । बिछिया सौभाग्य वती स्त्रियों को ही अनुमन्य थी ।
कमर में करधनी और पेटी पहनने वाले समृद्ध घर के माने जाते थे ।गौहन्ना में जिनको सोने का आभूषण बनवाना मुश्किल होता था वो चांदी के पहनते थे । भगतिन आजी
मोटे मोटे चांदी के कड़े पहनती थीं । दुरपदा बुआ कान में बड़े बड़े चांदी के छल्ले पहनती थीं यहां तक कि उनके कान के छेद उन छल्लों से बड़े होकर अंगूठे जितने मोटे हो गए थे लेकिन कभी भी उनको मोटा छल्ला उतारे नहीं देखा । कान में झुमका , कुंडल , बाली का पहनावा आम था । झुमका कुछ वैसा ही जैसा गानों में सुना होगा
झुमका गिरा रेे
बरेली के बाजार में
झुमका..
पंडि ताई न आजी की नाक में लटकने वाली सुराही धीरे धीरे चलन से बाहर हो गई स्मार्ट गहने ज्यादा चलने लगे सो नथुनी कील फैशन में अा गई और नाक के बीच में झूलने वाली झुलनी इतिहास बनने लगी । झुलनी तो कबीर के उपदेशों में भी उतर आई थी
झुलनी का रंग सांचा
हमार पिया..
सर के श्रृंगार में बिंदी टिकुली के साथ माथ बिंदिया नारी के सौंदर्य की साथी रही है ।
इन सबको जिन हाथों से सजाया जाता था उन हाथों के आभूषण में अंगूठी से लेकर कंगन, चूड़ी , बाजूबंद , दस्ताना पहने जाते थे । बाजूबंद कुहनी के ऊपर पहना जाता था जो अब नई पीढ़ी में चलन से बाहर है ।
सारे गहने होने के बावजूद अगर गला सूना है तो सारे आभूषण पहनने का कोई मतलब नहीं होता था । गले का मंगल सूत्र सौभाग्य की निशानी होती है । चेन, हार , कंठा, गुलू बन्द , मोहर माला ये सब गले के श्रृंगार थे जो ज्यादातर सोने के होते थे । नौलखा हार जिसके घर होते थे वो बड़े खानदान के माने जाते थे ।
ये गहने स्त्री सशक्तीकरण के प्रतीक थे । गाढ़े समय पर बहुत काम आते थे । पीढ़ी दर पीढ़ी बेटी , बहू को किसी संस्कार की तरह हस्तांतरित होते रहते थे ।
कहते हैं भारतीय संस्कृति में गहनों का प्रचलन आयुर्वेद से भी जुड़ा हुआ है एक्यू पंचर से इलाज की पद्धति का ये भी एक तरीका था । हमारे शरीर में खनिज की आवश्यकता वनस्पतियों के साथ साथ धातुओं से भी पूरी होती रही थी कुछ खनिज गहनों से भी त्वचा के माध्यम से शरीर को मिलते रहते थे । सोना चांदी च्यवन प्राश तो सुना ही होगा आयुर्वेद की ये औषधियां गहनों से मिल जाती थीं और लोग सौ सौ साल आराम से जिंदगी जीते थे । अब दवाओं की भरमार के बावजूद सौ तक बिरले लोग ही पहुंच पाते हैं । काश इन गहनों के विज्ञान को समय से समझ लिया जाता ।
(गौहन्ना डॉट कॉम पुस्तक का अंश)