कहाँ आप - कहाँ हम -
कहाँ आप - कहाँ हम ; कहाँ ख़ुशी- कहाँ गम ?
आप तो हुजूर हैं सरकार हैं।
बाग़ की रौनक हैं सदा बहार हैं।
सुनते हैं- दिल्ली में गद्दी गई है जम।
कहाँ आप - कहाँ हम ? कहाँ ख़ुशी- कहाँ गम?
जनहित में कराते सदा यज्ञ -जाप,
सैकड़ों के मसीहा लाखों के माई बाप।
आप किसी अवतार से बिलकुल नहीं हैं कम।
कहाँ आप - कहाँ हम ? कहाँ ख़ुशी- कहाँ गम ?
आपको कष्ट दूँ यह मुझे भाया नहीं,
यही सोच आपके दरवार में आया नहीं।
आपके तो चाकर भी पीते हैं विदेशी रम ।
कहाँ आप - कहाँ हम ? कहाँ ख़ुशी- कहाँ गम ?
शीशे के गलियारे में आप हैं पत्थर,
आप की दुक्की इक्के को करे सर।
आपसे टकराने की किसमें है दम।
कहाँ आप - कहाँ हम ? कहाँ ख़ुशी- कहाँ गम ?
- स्व.कवि अशोक अम्बर इटावा
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