Saturday, February 13, 2021

गोरईयन कै मेला

 गोरईयन कै मेला -

गोरैया बाबा का स्थान मिसिर बाबा की बगिया में ही था । टेराकोटा मूर्तियों का एक बड़ा समूह मिट्टी के टीले के ऊपर पूजित होता था । जब धान की फसल कटती थी तो पिटाई गोरईयन बगिया में होती थी । धान के पौधे के बंडल किसी लकड़ी के पटरे या खैंची पर पटक पटक के मंडाई पारम्परिक तरीके से की जाती थी । तैयार धान के ढेर को राशि कहते थे और पहली राशि का शुभ गोरईयन बाबा को धान चढ़ा कर होता था । पीटने वाले को मजदूरी लवनी के रूप में मिलती थी नापने के लिए छोटी छोटी डलिया जो गोबर से लिपी होती थी काम में आती थी । यही हाल गेंहू की दंवाई में भी होता था ये दंवाई शब्द दाबने से बना होगा जिसमें बैल गेंहू के पौधों पर तब तक चलते थे जब तक उनके खुरों से दब कर गेंहू नीचे न निकल जाए । जब से थ्रैशर अा गया तो गेंहू की दंवाई आसान हो गई लेकिन धान की दंवाई में कोई खास परिवर्तन नहीं आया ।
गोरईयन बाबा का मेला गौहन्ना में दशहरा के दिन होता था । मेला गांव का इकलौता मेला था जिसका बड़ी शिद्दत से इंतजार होता था । दूर दूर से हलवाई आकर दुकान लगाते थे और मिठाई , जलेबी, चाट पकौड़ी, टिकिया का मजा ही कुछ और होता था । गांव में उस दिन बहू बेटियां कोशिश कर के मायके आकर अपने गांव का मेला देखती थीं ।
बड़े गांव के बड़कऊ की टिकिया जिसने न खाई उसने टिकिया का असली मजा नहीं लिया । मेले में दंगल और कुश्ती बगल के खेत में होती थी । जिसे देखने के लिए बहुत बड़ी भीड़ उमड़ती थी । एक छोटे से गांव की साल भर की यह रौनक तब और बढ़ जाती थी जब रात में मीठे गांव वालों की नौटंकी का मंचन होता था । कभी सुल्ताना डाकू तो कभी आल्हा ऊदल का खेला । नौटंकी पंडाल खचाखच भरा होता था । रामलीला का अलग ही मजा था । गांव के दो किशोर गांव के लोगों के कंधे पर राम लक्ष्मण के रूप में रावण के पुतले पर तीर मारते थे और धुन बजती थीं
मंगल भवन अमंगल हारी
द्रवहु सो दशरथ अजिर बिहारी ।
राम सियाराम सियाराम जय जय राम...
रात की नौटंकी में माइक से आवाज आई
भूखल लोध ने सुल्ताना डाकू के रोल से खुश होकर दस रुपए का इनाम दिया ।
गामा पहलवान भला क्यों पीछे रहते ।
चमेली की नाच से खुश होकर गामा तेली ने बीस रुपए इनाम दिए । कम्पनी उनका तहेदिल से शुक्रिया अदा करती है ।
कड़ कड़ कड़ कड़ घम नगाड़े ने आवाज निकाली तो रात के सन्नाटे को चीरती हुई कुर्मी के पुर वा से आगे बराई तक जा पहुंची ।
किसी ने कहा
कहूं नाच होत है हो
गौहन्ना मा लागत है हो
चलो देख आवा जाय
और लाठी कांधे पर रखे चार लोग बरई से नाच देखने तीन किलोमीटर दूर गौहन्ना अा जाते थे ।
इस तरह गोरईयन कै मेला में लोक जीवन में खुशियों की बरसात हो जाती थी ।
फिलहाल अब मेला मात्र परम्परा में रह गया है । टेलीविजन, सिनेमा और समय के अभाव ने लोक कलाओं को लगभग लगभग खो दिया है । फेसबुक और यू ट्यूब पर गांव के मेले ठेले और लोक कला के कुछ अवशेष जरूर मिल जाते हैं ।
(गौहन्ना डॉट कॉम पुस्तक का अंश)

गोंदरी

 गोंदरी -

कहते हैं नींद न जाने टूटी खाट
नींद कुछ को आती ही नहीं तो गौहन्ना के लोग गोंदरी बिछा के आराम से सो जाते हैं । गोंदरी स्थानीय बिस्तर बनाने की कला है जिसे धान के पैरा यानि पुवाल से बनाया जाता है रस्सी और पुवाल की मदद से बनी यह संरचना महलों के गद्दे को फेल करती है । जाड़े के दिनों में गरीब ग्रामीणों के लिए इससे बड़ा सहारा मिल जाता है । मुंशी प्रेमचन्द की पूस की रात कहानी अगर पढ़ी होगी तो गांव के जाड़े का अहसास थोड़ा बहुत जरूर हुआ होगा । खेत में पानी लगाने से लेकर जानवर से खेतों की रखवाली तक सब कुछ किसान उस कड़कती ठंड में कर लेता है । किसी बगीचे में अगर पैरा यानि पुवाल की खरही अर्थात ढेर लगा है तो रात आसानी से कट जाती थी ।
गांव में जाड़े से निपटने के लिए तपता यानि अलाव जलता था । खेत के फूस व छप्पर के कराइन को फूंक के जाड़ा निपट जाता है । तपता गौहन्ना गांव की गतिविधियों का केंद्र हुआ करता था । मोहल्ले के लोग जिसके घर तपता जलता था वहां रात में भोजन के पहले या बाद में थोड़ी देर बैठ कर अपने सुख दुख साझा करते थे । किसके घर क्या हुआ ? किसके घर मेहमान आए किसके घर में आज क्या बना सब पता चल जाता था । बड़ों के बीच बच्चे भी घुस के इन चर्चाओं का रसास्वादन किया करते थे ।
तपते के चारों तरफ बैठने के लिए बीड़ा की व्यवस्था की जाती थी । बीड़ा पुवाल से ही बनता था जिसे आजकल के छोटे मोढ़े से समझा जा सकता है । बीड़ा केवल बुजुर्ग या सम्मानित व्यक्ति को ही मिलता था । बच्चे वगैरह जमीन पर बैठ कर आग सेंकते थे । मचिया संभ्रांत लोगों के बैठने की कुर्सी थी । मचिया छोटी खाट की तरह होती थी जिसे चार पायों पर रस्सी से बुनकर बनाया जाता था । खटिया या चारपाई पर बैठ कर कम ही लोग आग सेकते थे इसे अच्छा नहीं मानते थे हां तखत पर रोक नहीं थी। लेकिन अग्नि देवता का सम्मान जरूरी था इसलिए सब लोग नीचे बैठते थे । अगर किसी ने पैर के तलवे आग की तरफ कर दिए तो उसको बहुत डांट पड़ती थी कि आग देवता को पैर नहीं दिखाते । कहते हैं कि जब तक माचिस का आविष्कार नहीं हुआ था तब तक कुछ घरों में आग संरक्षित की जाती थी । एक दूसरे को चूल्हा जलाने के लिए आग मांगनी पड़ती थी ।
इस तपते में शाम के समय आलू और गंजी भूजी जाती थी जो रात के भोजन में बड़े चाव से खाई जाती थी । आलू का भरता गौहन्ना का मजेदार व्यंजन हुआ करता था और अगर आटे की बाटी भी साथ में भूज ली गई है तो पूर्ण आहार बन जाता था । अक्सर गौहन्ना की बटियों सादी ही होती थीं उनमें सत्तू कभी कभार ही पड़ता था । सादी बाटी भी घी , भरता और चटनी के साथ मस्त लगती थी ।
तपते की आग से कभी कभी बड़े हादसे भी हो जाते थे छप्पर की आग दो चार घर हर साल निपटा देती थी । लेकिन जाड़े से बचने का ये सबसे अच्छा उपाय था ।सुना है आजकल घरों में हीटर ने तपता की जगह लेे ली है और गद्दे रजाई ने गोंदरी प्रथा की जगह लेे ली है । फिर भी कुछ पुराने लोग और रात में सरकारी ट्यूब वेल से खेत सींचने वाले किसान अभी भी इसे बनाना जानते हैं ।
(गौहन्ना डॉट कॉम पुस्तक का अंश)

महरा दादा

 महरा दादा -

महरा दादा को जब से देखा तब से उनके स्वरूप में अंत तक ज्यादा परिवर्तन नहीं हुआ । छरहरा बदन , कद चार फीट , रंग काला और बाल काले ये थे महरा दादा जो हर एक के मददगार थे । बीड़ी पीना उनका एकमात्र शौक था । गौहन्ना में उनसे बड़े बूढ़े लोग उन्हें गंगा दीन कह कर बुलाते थे लेकिन एक पूरी पीढ़ी उन्हें महरा दादा ही कहती थी । महरा दादा कहार समुदाय के प्रतिनिधि के साथ साथ सम्पूर्ण कहार जाति और संस्कृति के चलते फिरते उदाहरण थे ।
चलो रे डोली उठाओ कहार
पिया मिलन की ऋतु आई
कहारों का समूह दुल्हन को डोली में बैठा कर पिया के घर तक पहुंचाते थे । दूल्हा जब विवाह करने जाता था तो पीनस में काहारों के कंधे पर ही जाता था । निर्गुण भक्ति धारा में आखिरी समय को भी विवाह उत्सव की उपमा दी जाती रही है और वहां भी चार कहार जीवन की डोली उठाते हैं और आत्मा रूपी जीव को परमात्मा रूपी पिया तक पहुंचाते हैं ।
ग्रामीण जीवन में चूल्हे चौके तक जिस जाति की पहुंच थी वो कहार होते थे । पहले के जमाने में हैंड पंप तो होते नहीं थे कुंए से पानी भर भर कर बड़े बड़े मिट्टी के कूड़े में घरों में रखा जाता था । ये पानी नहाने धोने के अलावा खाना बनाने व बर्तन मांजने के काम आता था । सुबह शाम पानी भरने का काम महरा दादा का परिवार ही करता था । जिसके बदले हर फसल में उन्हें तिहाई मिलती थी । तिहाई एक तरह का पारिश्रमिक होता था जो लगभग दस किलो अनाज प्रतिमाह जैसा होता था लेकिन मिलता एक साथ ही था वो भी फसल कटने पर । प्रायः दो चार घरों में जिनमें महरा दादा की जजमानी थी उन सबसे उनको साल भर खाने का पर्याप्त राशन मिल जाता था । सत्य नारायण बाबा की कथा और शादी विवाह में नेग चार भी मिल जाया करते थे । दूल्हे को स्नान कराने का हक सिर्फ इन्हीं को था । दूल्हा और दुल्हन को डोली या पीनस में ले जाने में इनके कंधे कट जाते थे लेकिन फिर भी हर एक की खुशी का हिस्सा बनने में महरा दादा का जवाब नहीं था ।
महरा दादा कहारों के नृत्य जिसे गांव में कंहरउवा नाच कहा जाता था के माहिर थे जब कंहरउवा नाच गांव में होता था तो पूरा गौहन्ना देखने जाता था । कंहरउवा गीत भी इसी समुदाय से जन्मा होगा जिसे बाद में कंहरवा के नाम से किताबों में स्थान मिला । उस गीत के बोल
धीमी लय में आगे बढ़ते है
सीता सोचे अपने मन मा मुंदरी कहवा से गिरी ...
इस तरह के न जाने कितने गीत
महरा दादा को मुंह जबानी याद थे । पढ़े लिखे वो थे नहीं लेकिन कढ़े जरूर थे। उनकी बिटिया मीरा जब छोटी थी तभी उनकी पत्नी को बीमारी हो गई और दुनिया छोड़ गईं लेकिन महरा दादा ने हिम्मत नहीं हारी । बिक्रम और मीरा को पाल पोस कर बड़ा किया । अपने हाथ से खाना बनाकर दोनों को खिलाना उनके रूटीन का हिस्सा था । इसी बीच मेहनत , मजदूरी से लेकर डोली उठाने की रस्म भी उन्होंने बदस्तूर जारी रखी । उनके बड़े भाई ने रोजगार के विकल्प के रूप में भड़भूजे का पेशा अपना लिया था ।
मिसिर दादा का तपता यानि अलाव महरा दादा के बिना नहीं जलता था । तपते के चारों ओर बैठी मंडली गांव और इलाके की चर्चा के साथ साथ कथा कहानी भी सुनती सुनाती थी । जब लोग रात में सोने जाते थे तो महरा दादा के गीत उन्हें मीठी नींद में ले जाते थे । भोर में महरा दादा का कहरा बड़ी दूर तक सुनाई देता था जो धुन और तरंग हवा में गूंजती थी वो अद्भुत होती थी ।
अपनी बेटी मीरा को खोने के बाद अपनी नातिन के सहारे एक बार फिर से उन्होंने जिंदगी को संभाला लेकिन अंत समय आते आते स्मृति लोप के शिकार हो गए । गौहन्ना में भी डोली और पीनस धीरे धीरे लुप्त हो गए और कारों ने उनकी जगह ले ली लेकिन रस्में निभाने के लिए कहार आज भी चाहिए ही ।
महरा दादा मिसिर दादा की अंत समय तक सेवा करते रहे लल्ला की शादी की हसरत उनके सामने पूरी हुई लेकिन लल्लन की शादी वो न देख सके । कहते थे
जल्दी बियाह कै लेव , हमरे सामने ।
खैर नियति को कुछ और ही मंजूर था । वकील साहब के जाने के बाद अंदर ही अंदर महरा दादा टूट गए थे । उसके एक साल बाद ही वो भी अनंत सफ़र की ओर प्रयाण कर गए इस बार वो दूल्हे थे और गांव वाले कंहार .
(गौहन्ना डॉट कॉम पुस्तक का अंश)

कुशहर मास्टर

 कुशहर मास्टर-

कहते हैं शिक्षा का प्रकाश जहां जहां जाता है वहां पीढ़ियों से चल रहा अंधकार ख़तम हो जाता है । वकील साहब लखनऊ यूनिवर्सिटी से पढ़ कर गांव आए थे घर के इकलौती संतान थे सो उनकी पढ़ाई लिखाई में कोई कोर कसर मिसिर दादा ने नहीं छोड़ी थी । ये अलग बात थी कि उनको यूनिवर्सिटी में राजनीति का चस्का कुछ ज्यादा ही लग गया था । ये चस्का परधानी के इलेक्शन में चमका और सबसे कम उमर के परधान यानि गौहन्ना गांव के मुखिया वकील साहब बन गए ।
पढ़े लिखे होने से नजरिया भी बदल जाता है अस्तु गांव की अशिक्षा दूर करने का विचार तेजी से आगे बढ़ा । एक स्कूल खोलने की योजना बनी । भुखल लोध, डाक्टर मौर्या , नेगपाल, कुशहर लोहार, कृष्णा बढ़ई , श्री चंद्र लाला सब इकठ्ठा हुए और स्कूल खोलने की योजना बनी । स्थान के लिए सबसे पिछड़े एरिया डेहवा को चुना गया।
मिसिर दादा ने मूंजा सरपत, झखरा, थूनी , थामरा सब कुछ दिया । गांव वालों के श्रमदान से गौहन्ना का पहला स्कूल देखते देखते खड़ा हो गया । बड़ी हसरत से पूरा गांव स्कूल देखने उमड़ पड़ा । स्कूल के पहले हेडमास्टर बने चन्द्र बहादुर श्रीवास्तव जिन्हे लोग चंद्र बहादुर चाचा कहते थे । उनकी पत्नी सहित दो शिक्षक और बनाए गए नगेसर मास्टर और कुशहर मास्टर । दिन रात मेहनत कर स्कूल को इस टीम ने चमका दिया ।
कुशहर मास्टर पतली कद काठी के लंबे शरीर के सौम्य व्यक्तित्व के धनी थे । ज्यादा पढ़े तो नहीं थे यही कोई आठवीं पास रहें होंगे लेकिन जिन बच्चों को पढ़ा दिया उन्हें सब कुछ मुंह जबानी याद रहता था । बीस तक पहाड़ा , ककहरा ये सब आस पास के किसी भी सरकारी स्कूल से बेहतर गौहन्ना के बच्चों को याद था । कुशहर मास्टर घर घर से बच्चों को बुला बुला कर था यूं कहें पकड़ पकड़ कर स्कूल लाते थे । स्कूल से उनका जुड़ाव इस कदर था कि रात में भी स्कूल का चक्कर मार आते थे । जब स्कूल सरकारी प्राइमरी स्कूल में बदल गया तो भी उन्होंने स्कूल जाना न छोड़ा । पहले तो सरकार की तरफ से नियुक्त अध्यापकों ने इनको स्कूल न आने को कहा सो इनकी तबियत धीरे धीरे बिगड़ने लगी । गांव के बच्चे इनके घर पढ़ने जाने लगे । स्कूल में छात्र संख्या भी घटने लगी। सरकारी मास्टर साहबान समझ गए कि स्कूल में इनकी आत्मा बसती है और बच्चों के लिए मास्टर साहब का मतलब कुशहर मास्टर ही था इसलिए सब ने मिल कर तय किया की अपनी तनख़ाह से कुछ रुपए हर महीने कुशहर मास्टर को दे के इन्हे यहीं स्कूल में अनौपचारिक रूप से रहने दिया जाय । इस तरह कुशहर मास्टर स्कूल में फिर से आने लगे और स्कूल की रौनक वापस लौट आई ।
वैसे भी छप्पर में शुरू हुए गांव के स्कूल की तनख़ाह मुश्किल से दस बीस रुपए महीना थी । बात दस बीस रुपए की नहीं थी गांव के विकास की थी अतएव किसी ने वेतन नहीं देखा बस ये देखा कि गांव शिक्षित कैसे हो . वकील साहब की मुहिम में सारे अध्यापक दिल से जुड़े थे । कुशहर मास्टर की तो आत्मा ही स्कूल में बसती थी । वकील साहब कभी कभी वेतन नहीं दे पाते थे लेकिन कुशहर मास्टर कभी शिकायत नहीं करते थे । उनके दो बेटे थे और दोनों फैजाबाद शहर में प्राइवेट संस्था में नौकरी करते थे । उनके बेटे परशु राम वकील साहब के साथ पढ़े भी थे इसलिए कुशहर मास्टर वकील साहब के अभिभावक की भूमिका में भी रहते थे । स्कूल कैसे चलाना है ये सब चंद बहादुर चाचा को कुशहर मास्टर बताते थे ।
गांव का स्कूल किसी तरह सरकारी हो जाय ये हसरत पूरी होने में लगभग छः साल लग गए । वकील साहब ने लड़ झगड़ के स्कूल को सरकारी में तब्दील करवा दिया । लेकिन अब भी स्कूल छप्पर में ही चल रहा था । वकील साहब भी कहां मानने वाले थे आखिर लखनऊ यूनिवर्सिटी के पढ़े थे । लंबी जद्दो जहद के बाद स्कूल की बिल्डिंग पास हो गई । इस बीच सरकारी हेड मास्टर ने स्कूल की ईंट अपने घर गिरवा कर अपना घर बनवाना शुरू कर दिया । गांव वाले अवाक रह गए जब हेड मास्टर प पर कार्यवाही की नौबत आई तो आनन फानन में ईंट स्कूल तक पहुंची लेकिन फिर भी सीमेंट बालू कम पड़ गई । वकील साहब ने अपने घर की ईंट सीमेंट बालू कुशहर मास्टर के कहने से स्कूल में लगवा दी मिसिर दादा अपने बेटे के इस कृत्य को बेबसी में स्वीकार कर गए । पूरे गांव ने फिर से एकबार श्रमदान कर स्कूल का लिंटर डलवा दिया । इस तरह कुशहर मास्टर के सपनों को स्कूल गौहन्ना बनकर तैयार हो गया और हेड मास्टर सस्पेंड होने से बच गया । कुशहर मास्टर धीरे धीरे उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंच गए थे लेकिन उनकी आत्मा और प्राण में बसा यह स्कूल आज जूनियर हाई स्कूल हो चुका है । कुशहर मास्टर की आत्मा स्वर्ग से जब इसे देखती होगी तो उसे अपार खुशी मिलती होगी ।
(गौहन्ना डॉट कॉम पुस्तक का अंश)

मुल्ला पाड़े

 मुल्ला पाड़े

है न सुनने में कुछ अजीब सा लेकिन ये सच है जब गौहन्ना गांव की अदब की संस्कृति में कुछ नई बात तलाशी जाएगी तो इस परम्परा को देख सुन कर लोग चौंक पड़ेंगे क्योंकि शायद ही इस तहजीब व मजाक का सिलसिला कही और चलन में हो ।
दरअसल मुल्ला पाड़े का असली नाम सतीश चंद्र पांडेय था अब गौहन्ना की मजाकिया संस्कृति में एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को मौलाना कह के चिढ़ाती है । बगल मे बड़ागांव मुस्लिम बाहुल्य गांव है और कोई भी हिन्दू अपने को मुसलमान कहलाना क्यों पसंद करेगा सो चिढ़ाने की यह परम्परा चल पड़ी होगी । इसी चलन को जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे चल रहा है और आज भी बदस्तूर जारी है उसमें वकील साहब के जिगरी दोस्त सतीश चंद्र पांडेय जो वकील साहब के गांव के रिश्ते में चाचा लगते थे को मुल्ला पाड़े की उपाधि मिल गई । उपाधि वकील साहब ने दी तो वकील साहब को भी पांडेय जी ने मौलवी साहब कहना शुरू कर दिया ।
मुल्ला पाड़े को वकील साहब के तंज पर अपनी पीढ़ी यानि वकील साहब के पिता जी का साथ मिलता था । इतना ही नहीं वकील साहब के बच्चे अपने बाबा की पीढ़ी का साथ देते थे यानि उनके लिए वकील साहब की पीढ़ी मौलाना वाली पीढ़ी थी । कहने का मतलब हर अगली पीढ़ी तुरन्त पहले वाली पीढ़ी के लिए चिढ़ाने व मजाक का सिलसिला जारी रखती थी ।
"का हो उस्मानी नमाज पढ़ आयो का"?
-- बाल जी ने पवन बढ़ई को चिढ़ाया
पवन बढ़ई भला क्यों पीछे रहते उन्होंने भी पलट वार किया
"तोहार रोज़ा खुला कि नाही
न खोले होव तो बड़े गांव चले जाव
सेंवई खाय का मिल जाए".
इस तरह के संवाद गौहन्ना के रोजमर्रा की आदतों में है ।
ये सिलसिला कब से शुरू हुआ होगा कहना मुश्किल है लेकिन मजहब परिवर्तन से इसको जोड़ कर देखा जा सकता है जब कुछ हिन्दुओं ने आक्रांताओं से डर कर या लालच में मुस्लिम धर्म अपना लिया होगा तो उन्हें सामाजिक पद क्रम सोपान में नीचे रख दिया गया होगा । यह बात इससे भी समझी जा सकती है कि मुस्लिम समुदाय के लिए हिन्दुओं के घरों में वहां बर्तन अलग ही होते थे जो प्रायः कांच आदि के होते थे जैसे कांच का गिलास या चीनी मिट्टी की प्लेट ।
ऐसा नहीं है कि गौहन्ना गांव में मुसलमान बिरादरी नहीं थी । दर्जी टोला मुसलमानों का ही था जिनको हर हिन्दू हर फसल पर तिहाई के रूप में मेहनताना देता था । बड़े अदब और सम्मान से अब्दुल बाबा मतलब अब्दुल दर्जी को पूरा गांव बाबा बुलाता था ।
पीढ़ी अंतराल वाले इस मजाकिया सिलसिले को जब तक समाज शास्त्री अपने नजरिए से समझे तब तक पुख्ता रूप से बस इतना समझिए कि इस परम्परा को गौहन्ना और आस पास के गांव जाने अनजाने आज भी निभा रहे हैं और उनके रोजमर्रा के जीवन में ये चुहल बाजी रिश्तों में मिठास घोलती रहती है। बताते चलें कि सतीश चंद्र पांडेय उर्फ मुल्ला पाड़े अंत समय तक वकील साहब यानि राम तेज मिश्रा से दोस्ती निभाते रहे उनके जाने के बाद वकील साहब अकेले पड़ गए । सब कुछ होते हुए भी मुल्ला पाड़े के जाने का सूनापन वकील साहब जिन्हे मुल्ला पाड़े मौलवी साहब कहते थे कोई दूसरा न भर सका , उनकी जिंदगी में कोई दूसरा मुल्ला पाड़े दोबारा न मिला ।
(गौहन्ना डॉट कॉम पुस्तक का अंश)

Tuesday, October 13, 2020

फरा-

 फरा :


(ललित मिश्र के ब्लॉग झल्लर मल्लर दुनिया से )


   कुछ नया नाम लग रहा है न? लेकिन गौहन्ना में ये नाम न जाने कब से चल रहा होगा । अवध क्षेत्र में इस व्यंजन को फ़रा नाम से ही जानते हैं । आपकी सुविधा के लिए बता दें कि इसकी तुलना आप मोमोज से कर सकते हैं । लेकिन दोनों में थोड़ा अंतर भी जानना जरूरी होगा नहीं तो इस अवधी व्यंजन के आंनद को महसूस नहीं कर पाएंगे ।


    जिस तरह हर क्षेत्र का कुछ खास व्यंजन होता है उसी तरह अवध क्षेत्र का फरा बहुत खास होता है । इसे चावल के आटे से बनाते हैं और चावल के आटे की छोटी छोटी पतली रोटियों के ऊपर उड़द की पिसी भीगी हुई मसाले वाली दाल इसमें भर दी जाती है । किसी छोटी कागज की नाव की तरह इसका आकार होता है लेकिन इसका मुंह खुला रहता है । फरा को बटुली या पतीली के ऊपर भाप में लगभग बीस से पच्चीस मिनट पकाना पड़ता है ।

मोमोज और फरा में मूल अंतर मुंह के खुले और बन्द होने का होता है। मोमोज पूरी तरह बन्द होता है जबकि फरा का मुंह खुला रहता है और इसका अंदर का सामान बिल्कुल नायाब होता है ।


    कहते हैं कि किसी पर्यटक स्थल पर जब लोग जाते है तो वहां के स्थानीय व्यंजन ढूंढ़ते हैं । लेकिन अवध के ढाबे और होटल अवध के कम पंजाब के नकल में ज्यादा फंस गए, इसलिए वहां आप फरा नहीं ढूंढ़ पाएंगे । करते भी क्या ट्रक का हाईवे, ड्राइवर, खलासी सब पंजाब के तो खाना भी उसी तरह का चल निकला किसी का ध्यान इस बात पर गया ही नहीं कि अयोध्या भ्रमण पर आने वाले पाहुन को लोकल डिश की भी तलाश होगी ठीक उसी तरह जिस तरह आपको दक्षिण भारत में सांभर- डोसा की तलाश रहती है । ठीक उसी तरह जब आप गुजरात में ढोकला और खांख्रा ढूंढ़ते हैं । ठीक उसी तरह जिस तरह आप पंजाब में मक्के की रोटी और सरसों का साग ढूंढ़ते हैं जो आपको वहां के हर ढाबे पर मिल जाता है ।


   गौहन्ना और आस पास के क्षेत्र में फरा बनाने के लिए चलनी या जालीदार सिकहुला का प्रयोग किया जाता है । इसको बनाने का चलन कार्तिक मास से फाल्गुन तक ज्यादा होता है । तैयार फरे को घी के साथ खाने का आंनद ही कुछ और होता है । आम या इमली की मीठी चटनी के साथ इसे परोसा जाता है । इसको गरमा गरम खाने का मजा ही कुछ और है लेकिन अगर ये बच जाए तो घी और जीरे के छौंक के साथ इसे नए अंदाज में आप खा सकते हैं । इस डिश के साथ गांव में गन्ने के रस से चावल का रसियाव भी खाया जाता है । जो किसी खीर की तरह बनता है । गांव के इन व्यंजनों में जन्मों जन्मों की तृप्ति एक साथ मिल जाती है । 


    फरा के सीजन में ही दलभरी पूड़ी का चलन भी रहता है । चने की दाल को पीस कर रोटी के अंदर भर कर बनाने की कला गांव - गांव में प्रचलित है । ये दलभरी पूड़ी तवे पर बड़े इत्मीनान से सरसों के तेल में सेकीं जाती है और मक्खन , गुड या अचार खासकर भरवा मिर्चे के साथ परोसी जाती है ।जिस के मुंह ये एक बार लग गई तो लग गई फिर आदमी आलू का पराठा खाना भूल जाता है ।

   इस तरह के न जाने कितने व्यंजन अवध की स्थानीय ग्रामीण संस्कृति में घर - घर बनाए जाते हैं । इनमे से कुछ की चर्चा करते रहेंगे । फिलहाल जब तक होटल और ढाबे में ये डिश नहीं बनने लगती तब तक जब भी अवध क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में जाएं तो इन व्यंजनों को खाना न भूलें ।संकोच मत करिएगा कि कोई खिलाएगा नहीं । जम के लोग खिलाएंगे , खुश होकर खिलाएंगे ।


(गौहन्ना डॉट कॉम पुस्तक से साभार )

Wednesday, October 7, 2020

शुक्ला दरोगा-

 शुक्ला दरोगा -


    नाम तो उनका शंकर दत्त शुक्ला था । नए नए रौनाही थाने में आए थे । लेकिन इलाके के लोग उन्हें शुक्ला दरोगा के नाम से ही जानते थे । चलते बुलेट से थे। जिस तरफ उनकी बुलेट निकलती थी रास्ता साफ हो जाता है । तब के जमाने में दबंग जैसी फिल्में नहीं बनी थीं न ही सिंघम का किरदार। बल्कि  पुलिस तो तब पहुंचती थी जब हीरो अपना काम कर चुका होता था । लेकिन फैजाबाद जिले के रौनाही इलाके के हीरो तो शुक्ला दरोगा ही थे । लंबा चौड़ा शरीर और ऊपर से पहलवान और जब बुलेट पर बैठते थे अकेले ही पूरा थाना लगते थे । 


   ये वो दौर था जब गांव के इलाकों में चोरी, डकैती, लूट आम घटनाएं हुआ करती थीं । गौहन्ना भी इससे अछूता न था । उस समय गौहन्ना बाराबंकी जिले का हिस्सा हुआ करता था लेकिन था वर्तमान अयोध्या जिले का बॉर्डर । थाना भी रुदौली हुआ करता था लेकिन शुक्ला दरोगा के आने से आस पास के थानों से भी अपराधी नदारद होने लगे थे । खौफ उनका इतना था कि गांव के किनारे अगर बुलेट की आवाज आ जाय तो  पुराने डकैतों के उस्ताद के भी पैजामे गीले हो जाते थे । वकील साहब से दोस्ती के नाते उनका हलके से बाहर गौहन्ना गांव आना लगा रहता था । गांव वाले भी उन्हें अपना ही दरोगा समझते थे ।


    प्रशासन के फॉर्मूलों में एक अघोषित पर मशहूर फॉर्मूला 'कौआ टांगना' होता है । जिस तरह किसान फसल बचाने के लिए  खेत में एक कौआ मार कर टांग देता है तो अगले दिन से उस खेत में कोई भी कौआ नजर नहीं आता उसी तरह शुक्ला जी भी करते थे । शुक्ला दरोगा इस फार्मूले के माहिर थे । फैशन के चक्कर में न जाने कितने हिप्पी लौंडे उनकी भेंट चढ़ चुके थे मजनुओं के लंबे -लंबे बाल को नाई से उस तरह उतरवाते थे जैसे खुरपे से घास छीली जाती है. उसके बाद तो लंबे बालों का शौक एक लंबे समय तक मजनू लोग पूरा नहीं कर पाए ।ये घटना भले रौनाही चौराहे पर हुई हो लेकिन खबर गांव गांव में चटकारे लेकर सुनी और सुनाई जाती थी ।


"अरे आज एक जने आधी बांह मोड़ के रौनाही गे रहे 

शुक्ला दरोगवा पकर के उनके कपड़ा आधी बांह से कटवाय दिहिस ।" ....

  ....    शाम को अलाव के पास इस तरह की चर्चाएं गांव गांव में आम थीं । संभ्रांत लोग और सभ्य समाज में इस तरह की चर्चाएं एक तरह से लोगों में कानून के प्रति और अधिकारी के प्रति भरोसे का प्रतीक थीं और उसका असर ये था कि चोर उचक्के लफंगे और मजनुओं ने भूमिगत होने में ही भलाई समझी । इस दौर में मीडिया के नाम पर रेडियो व अखबार ही हुआ करते थे ,आज का दौर होता तो सोशल मीडिया पर तानाशाह होने का आरोप लगा के वीडियो वायरल कर दिया जाता । हालांकि शुक्ला दरोगा जितना करते थे उससे ज्यादा उनकी कहानियां उस दौर में वायरल हुआ करती थीं । अब कौन तस्दीक करने जाय कि ये सब हुआ भी या नहीं। उन्हीं कहानियों में एक कहानी ये भी थी कि कोई एक हाथ से सायकिल चला रहा था तो शुक्ला जी ने उसका आधा हैंडल कटवा दिया था । कोई अपनी पत्नी को धूप में पैदल बिदा करा कर ला रहा था तो उसको कंधे पर लाद कर लेे जाने का फरमान सुना दिया आदि आदि । ये सब कहानियां बड़े नए नए अंदाज में लोग एक दूसरे को सुना के खुश हुआ करते थे ।


   मुगदर भांजने और कसरत के शौकीन शुक्ला जी दस दस लीटर दूध पीने के लिए मशहूर थे । कटोरा भर के घी पीने वाले शुक्ला दरोगा इलाके की जनता के हीरो थे और जनता के रहनुमा । जिनके नाम से ही पूरा इलाका चैन की नींद सोता था। इस दौर में  सिपाही सायकिल से ही अपनी बीट का दौरा करते थे । थ्री नॉट थ्री टांगे और बेंत सायकिल में फंसाए ये सिपाही जिस गांव में रात हो जाती थी वहीं रुक जाते थे खाने पीने का इंतजाम किसी संभ्रांत परिवार से हो ही जाता था । गांव का चौकीदार साहब के पैर दबाने से लेकर नहलाने तक पूरा खयाल रखता था । 

सुबह सुबह गांव से निकलने के पहले सिपाही दसियों सूचना लेकर निकलता था । हफ़्ते भर की मुखबिरी गांव में इकठ्ठा हुई रहती थी जो मुखबिर न भी हो वो अपने नम्बर बढ़ाने के चक्कर में कुछ न कुछ बता ही देता था ।


'अरे पाड़े कहां जात हो ?

सुना है शुक्ला दरोगा आवा हैं।उनही का देखै जाइत है ।'

   प्रेम चन्द के नमक का दारोगा का ह्रदय परिवर्तन तो बाद में होता है लेकिन शुक्ला दरोगा जन्मजात जनता के सेवक थे सो बने ही रहे ।जनता ने भी  इस अफसर को सर आंखों पर बिठा के रखा।    इस दौरान उन्होंने सख्ती व  इमानदारी भी बना कर रखी ।

    आम जनता अपने हीरो शुक्ला दरोगा को देखने के लिए उमड़ पड़ती थी जिस तरफ से उनकी बुलेट गुजरती थी उस तरफ उनकी चर्चा हफ़्ते भर रहती थी । साहब का इकबाल जिस तरह बुलंद होना चाहिए उस तरह बुलंद था । बताते हैं कि एक बार रेलवे की पटरी पर भी बुलेट दौड़ा दिए थे । उनके तबादले के बाद भी कई सालों तक शुक्ला दरोगा के लिए इलाका तरसता रहा। संभवतः पुलिस उपाधीक्षक पद से सेवा निवृत्ति के बाद भी ये सिंघम आज भी उस दौर के लोगों के दिलों दिमाग में बसा हुआ है ।

- डॉ ललित नारायण मिश्र


(गौहन्ना डॉट कॉम पुस्तक का अंश)